एक ही दिन हरतालिका तीज और गणेश चतुर्थी: 14 सितंबर को बन रहा 'गणेश-गौरी योग', जानिए दोनों व्रत के पूजा मुहूर्त

धर्म डेस्क: इस साल श्रद्धालुओं के लिए एक विशेष संयोग बन रहा है। 14 सितंबर, सोमवार को हरतालिका तीज और गणेश चतुर्थी, दोनों पर्व एक ही दिन पड़ रहे हैं। यही वजह है कि इस दिन को शास्त्रों में 'गणेश-गौरी योग' के रूप में देखा जा रहा है, जिसे उमा-महेश्वर पूजन के लिए अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है।
तिथि का गणित: कब से कब तक
- तृतीया तिथि: 13 सितंबर की सुबह 07:08 बजे से शुरू होकर 14 सितंबर की सुबह 07:06 बजे समाप्त होगी।
- चतुर्थी तिथि: 14 सितंबर की सुबह 07:06 बजे से शुरू होकर 15 सितंबर की सुबह 07:44 बजे तक रहेगी।
13 नहीं, 14 सितंबर को ही क्यों
शास्त्रों के अनुसार द्वितीया से युक्त तृतीया ग्राह्य नहीं मानी जाती, जबकि चतुर्थी से युक्त तृतीया शुद्ध मानी जाती है। 13 सितंबर को सूर्योदय के समय द्वितीया तिथि थी, इसलिए वह तिथि 'द्वितीया-विद्धा' हो गई। वहीं 14 सितंबर को सूर्योदय-व्यापिनी उदयातिथि होने के कारण मुख्य व्रत, संकल्प और प्रातःकालीन पूजन इसी दिन शास्त्रसम्मत माना जाएगा।
हरतालिका तीज के पूजा मुहूर्त
- प्रातःकालीन पूजा: अमृत और लाभ चौघड़िया में सुबह 06:05 से 07:06 बजे तक। संकल्प और तृतीया-स्पर्शी पूजन सुबह 07:06 बजे से पहले पूर्ण कर लेना सर्वोत्तम माना गया है।
- प्रदोष काल संध्या पूजन: शाम 06:14 से रात 08:34 बजे तक। इस दौरान चतुर्थी तिथि रहेगी, इसलिए यह समय गणेश-गौरी पूजन और आरती के लिए उपयुक्त है।
- व्रत पारण: 15 सितंबर, मंगलवार को सुबह 6 बजे के बाद, चतुर्थी में सूर्योदय के पश्चात।
गणेश चतुर्थी पर मूर्ति स्थापना का मुहूर्त
गणेश चतुर्थी पर भगवान गणपति की प्रतिमा स्थापित करने के लिए 14 सितंबर को सुबह 10:50 बजे से दोपहर 01:18 बजे तक का समय बताया गया है। इसी अवधि में घरों और पंडालों में प्रतिमा स्थापित की जा सकती है।
इसी दिन से 11 दिवसीय गणेश महोत्सव का आरंभ होगा, जिसका समापन 25 सितंबर को अनंत चतुर्दशी के दिन विसर्जन के साथ होगा।
दोनों पर्वों का एक साथ आना क्यों खास
हरतालिका तीज पर सुहागिन महिलाएं अखंड सौभाग्य की कामना से निर्जला व्रत रखती हैं और शिव-पार्वती का पूजन करती हैं। वहीं गणेश चतुर्थी पर विघ्नहर्ता गणपति की स्थापना होती है। दोनों का एक ही दिन पड़ना गणपति-उमा संवाद और मातृ-पूजन योग के आधार पर विशेष फलदायी माना गया है।
श्रद्धालुओं के लिए सलाह यह है कि प्रातःकाल तृतीया से जुड़े संकल्प और पूजन पहले पूरे कर लें, और उसके बाद चतुर्थी के मुहूर्त में गणपति की स्थापना करें, ताकि दोनों पर्वों का विधिवत पालन हो सके।
