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पिता के मार्गदर्शन में निखरी वुशू खिलाड़ी गौरी, स्टेट स्कूल गेम्स में जीता स्वर्ण पदक

17 September 2026
पिता के मार्गदर्शन में निखरी वुशू खिलाड़ी गौरी, स्टेट स्कूल गेम्स में जीता स्वर्ण पदक

नई दिल्ली: मेहनत, अनुशासन और पिता के मार्गदर्शन के दम पर युवा वुशू खिलाड़ी गौरी राज लगातार अपनी पहचान बना रही हैं। एसवी को-एड विद्यालय की कक्षा 12 की छात्रा गौरी इस समय स्टेट स्कूल गेम्स की अंडर-19 बालिका वर्ग की 65 किलोग्राम भार श्रेणी में स्वर्ण पदक विजेता हैं।

गौरी के खेल सफर में उनके पिता राहुल राज की भूमिका सबसे अहम रही है। राष्ट्रीय पदक विजेता वुशू खिलाड़ी और कोच राहुल ने बेटी को खेल की तकनीक के साथ-साथ अनुशासन, आत्मविश्वास और कठिन परिस्थितियों में डटे रहने की सीख दी।

चुनौतियों के बीच जारी रही तैयारी

गौरी के इस सफर में कई चुनौतियां और उतार-चढ़ाव आए, लेकिन पिता-बेटी की जोड़ी ने मेहनत जारी रखी। प्रशिक्षण, फिटनेस, पोषण और प्रतियोगिताओं के अनुभव पर लगातार काम किया गया। भार वर्ग वाले खेलों में यह संतुलन आसान नहीं होता, क्योंकि खिलाड़ी को ताकत और वजन दोनों को एक साथ साधना पड़ता है।

अब गौरी का लक्ष्य राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व करते हुए पदक जीतना है। परिवार के भीतर ही कोच मिल जाने से उन्हें अभ्यास का समय और तकनीकी मार्गदर्शन दोनों लगातार मिलते रहे हैं।

घर में ही प्रशिक्षक होने का एक और फायदा यह रहा कि प्रतियोगिता के बाद हुई गलतियों पर तुरंत काम किया जा सका। मुकाबले के तुरंत बाद की गई समीक्षा खिलाड़ी के लिए सबसे उपयोगी मानी जाती है, क्योंकि तब हर चाल और हर चूक ताजा होती है।

स्कूल खेलों से बनती है आगे की राह

राज्य स्तर की स्कूल प्रतियोगिताएं युवा खिलाड़ियों के लिए पहला बड़ा मंच होती हैं। यहां मिली सफलता के बाद खिलाड़ी राष्ट्रीय स्तर की स्पर्धाओं की ओर बढ़ते हैं, जहां प्रतिस्पर्धा कहीं अधिक कड़ी होती है। यही वजह है कि कोच स्कूल स्तर की प्रतियोगिताओं को तैयारी का अहम पड़ाव मानते हैं।

बेटियों के लिए आत्मरक्षा का जरिया

गौरी का मानना है कि बेटियों के लिए मार्शल आर्ट सीखना आत्मविश्वास और आत्मरक्षा, दोनों की दृष्टि से उपयोगी है। मार्शल आर्ट का प्रशिक्षण शरीर की फुर्ती और संतुलन बढ़ाने के साथ मानसिक दृढ़ता भी विकसित करता है।

वुशू मार्शल आर्ट की एक प्रतिस्पर्धी शैली है, जिसमें ताओलू यानी निर्धारित मुद्राओं का प्रदर्शन और सांडा यानी आमने-सामने की भिड़ंत, दोनों प्रारूप होते हैं। स्कूल स्तर की प्रतियोगिताओं में मिली सफलता ऐसे खिलाड़ियों के लिए आगे की राह तैयार करती है।