बरेली में जन्मा देश का पहला जेनेटिकली सेलेक्टेड एलीट गिर बछड़ा, रोज 40 से 60 लीटर दूध की उम्मीद

बरेली: देश में पहली बार आनुवंशिक चयन से तैयार एलीट गिर बछड़ों का जन्म बरेली में हुआ है। सोमवार को यहां आयोजित कैटल जीनोमिक्स समिट 2026 के दौरान कार्यक्रम स्थल पर ही इन बछड़ों का जन्म हुआ, जिसे देखने के लिए देश के कई राज्यों से आए पशुपालन विशेषज्ञ मौजूद रहे। अनुमान है कि इस पद्धति से तैयार गायें आगे चलकर प्रतिदिन 40 से 60 लीटर तक दूध देंगी।
गिर देश की सबसे भरोसेमंद देसी नस्लों में गिनी जाती है, लेकिन औसत दुग्ध उत्पादन के मामले में यह लंबे समय से विदेशी नस्लों से पीछे रही है। जीनोमिक चयन की तकनीक में बछड़े के जन्म से पहले ही उसके आनुवंशिक गुणों की पहचान कर ली जाती है, ताकि सबसे बेहतर गुणों वाली पीढ़ी को ही आगे बढ़ाया जाए। समिट में अगली पीढ़ी की सीक्वेंसिंग तकनीक का प्रदर्शन भी किया गया।
किसानों के लिए क्या बदलेगा
मध्य प्रदेश के उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ला ने कार्यक्रम में कहा कि आधुनिक जेनेटिक्स किसानों की समृद्धि का द्वार खोलेगा। उत्तर प्रदेश के पशुपालन मंत्री धर्मपाल सिंह ने कहा कि एलीट बुल्स, भ्रूण और सेक्स्ड सीमेन का स्वदेशी उत्पादन देश को आनुवंशिक आत्मनिर्भरता की ओर ले जा रहा है। अब तक इनमें से अधिकांश सामग्री के लिए भारत को बाहर देखना पड़ता था।
बीएल एग्रो के चेयरमैन डॉ. घनश्याम खंडेलवाल ने कहा कि बेहतर जेनेटिक्स और सर्कुलर इकोनॉमी मॉडल से किसानों के लिए आय के नए स्रोत पैदा होंगे। आयोजकों के मुताबिक लक्ष्य जेनेटिक्स और प्रजनन तकनीक को जोड़कर 360 डिग्री सर्कुलर इकोनॉमी मॉडल विकसित करना है। इसके लिए उत्तर प्रदेश के अलावा महाराष्ट्र, बिहार और मध्य प्रदेश से भी बातचीत चल रही है।
बरेली बनेगा इस काम का केंद्र
- भ्रूण उत्पादन: बरेली स्थित सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में वर्ष 2027 के अंत तक हर महीने 15,000 भ्रूण तैयार करने की योजना है।
- दुग्ध क्षमता: आनुवंशिक रूप से चयनित गिर गायों से प्रतिदिन 40 से 60 लीटर तक दूध मिलने का अनुमान है।
- राज्यों तक विस्तार: उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार और मध्य प्रदेश में यह मॉडल ले जाने पर बातचीत चल रही है।
कार्यक्रम में वन मंत्री डॉ. अरुण कुमार, कैंट विधायक संजीव अग्रवाल और मीरगंज विधायक डॉ. डीसी वर्मा समेत कई जनप्रतिनिधि मौजूद रहे। पशुपालन से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि यह तकनीक छोटे किसानों तक किफायती दर पर पहुंची तो देसी नस्लों को लेकर बनी हिचक टूटेगी और दुग्ध उत्पादन का पूरा गणित बदल सकता है।
