भारत के प्रस्ताव से बना था न्यू डेवलपमेंट बैंक, आज सबसे बड़ा हिस्सेदार भी भारत: 139 परियोजनाओं में 42.9 अरब डॉलर मंजूर

नई दिल्ली: ब्रिक्स देशों के साझा वित्तीय संस्थान न्यू डेवलपमेंट बैंक (एनडीबी) की नींव भारत के ही प्रस्ताव से पड़ी थी, और आज इसके कुल मंजूर पोर्टफोलियो में सबसे बड़ी हिस्सेदारी भी भारत की ही है। बैंक ने अब तक 139 से अधिक परियोजनाओं के लिए 42.9 अरब डॉलर से ज्यादा की राशि मंजूर की है, जिसमें करीब 27.5 फीसदी हिस्सा भारत का है।
2012 के दिल्ली सम्मेलन से शुरू हुआ सफर
इस बैंक का विचार 2012 में नई दिल्ली में हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भारत ने रखा था। 2013 के डरबन सम्मेलन में इसकी व्यवहार्यता पर सहमति बनी, 2014 में ब्राजील के फोर्टालेजा सम्मेलन में औपचारिक समझौता हुआ और 2015 में बैंक ने काम शुरू कर दिया। इसका मुख्यालय शंघाई में है और इसके पहले अध्यक्ष भारतीय बैंकर के.वी. कामथ बने।
बराबरी पर टिका ढांचा
बैंक की अधिकृत पूंजी 100 अरब डॉलर और अभिदत्त पूंजी 50 अरब डॉलर है। पांचों संस्थापक देशों ने 10-10 अरब डॉलर का बराबर योगदान दिया और सभी के पास 20-20 फीसदी मताधिकार है। किसी भी सदस्य के पास वीटो का अधिकार नहीं है। बैंक की रेटिंग एए+ है।
भारत में किन परियोजनाओं को मिला पैसा
भारत के लिए अब तक 28 से अधिक परियोजनाओं में करीब 10 अरब डॉलर मंजूर हो चुके हैं।
- शहरी परिवहन: दिल्ली-गाजियाबाद-मेरठ आरआरटीएस (नमो भारत), चेन्नई मेट्रो फेज-2, इंदौर मेट्रो और मुंबई मेट्रो।
- सड़क और पुल: मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार और पूर्वोत्तर राज्यों में ग्रामीण तथा राज्य मार्गों और पुलों का निर्माण।
- ऊर्जा और जल: राष्ट्रीय सौर मिशन, पवन ऊर्जा परियोजनाएं और अमृत योजना के तहत जलापूर्ति एवं सीवरेज के काम।
- आपात सहायता: 2020 में कोविड-19 फास्ट-ट्रैक इमरजेंसी असिस्टेंस प्रोग्राम के तहत सहायता।
अप्रैल 2025 में बैंक ने मुंबई में एनएबीएफआईडी के साथ एक समझौता ज्ञापन पर भी हस्ताक्षर किए।
अगले पांच साल में भारत के लिए 7.5 अरब डॉलर
बैंक की 2027 से 2031 की रणनीति के तहत भारत के लिए पांच वर्षों में 7.5 अरब डॉलर की योजना है। इसमें 5 अरब डॉलर संप्रभु ऋण और 2.5 अरब डॉलर रुपया बॉन्ड कार्यक्रम के रूप में होंगे। बैंक चीन में पांडा बॉन्ड और दक्षिण अफ्रीका में रैंड बॉन्ड भी जारी कर रहा है, और उसका लक्ष्य अपने कुल ऋण का कम से कम 30 फीसदी स्थानीय मुद्राओं में देना है।
'किसी एक मुद्रा के आगे झुकने की जरूरत न पड़े'
बैंक की अध्यक्ष दिल्मा रूसेफ ने इसके उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए कहा कि मकसद ब्रेटन वुड्स संस्थाओं को ध्वस्त करना नहीं, बल्कि एक ऐसा ढांचा खड़ा करना है जिसमें विकासशील देशों को किसी एक मुद्रा या संस्था के आगे झुकना न पड़े।
बैंक के सामने चुनौतियां भी हैं, जिनमें रूस पर लगे प्रतिबंध, यूएई, मिस्र, बांग्लादेश, अल्जीरिया और उरुग्वे जैसे नए सदस्यों का समावेश, और शंघाई मुख्यालय के चलते चीनी प्रभाव के बीच भारत तथा ब्राजील के समान अधिकारों को बनाए रखना शामिल है।
