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सरकारी जमीनों के आवंटन पर कांग्रेस का तंज: 'नाम से मुख्यमंत्री, काम से प्रॉपर्टी डीलर'

12 September 2026
 सरकारी जमीनों के आवंटन पर कांग्रेस का तंज: 'नाम से मुख्यमंत्री, काम से प्रॉपर्टी डीलर'

देहरादून: राजपुर रोड स्थित एक होटल में शुक्रवार, 12 सितंबर को कांग्रेस की चार्जशीट कमेटी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर उत्तराखंड में सरकारी और लीज की जमीनों के आवंटन को लेकर राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। प्रेस कॉन्फ्रेंस में चार्जशीट कमेटी के अध्यक्ष करन माहरा, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल और नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने संयुक्त रूप से सरकार पर निशाना साधा।

कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि प्रदेश में सरकारी जमीनों का लगातार इस्तेमाल और आवंटन किया जा रहा है, जिससे भविष्य में राज्य के विकास के लिए पर्याप्त जमीन उपलब्ध नहीं रहेगी। करन माहरा ने कहा कि सरकारी जमीन राज्य की संपत्ति है और इसका इस्तेमाल इस तरह होना चाहिए, जिससे आने वाली पीढ़ियों के हित सुरक्षित रहें।

सरकारी जमीनों के इस्तेमाल पर उठाए सवाल

करन माहरा ने कहा कि हॉर्टिकल्चर, कुमाऊं मंडल विकास निगम (KMVN), गढ़वाल मंडल विकास निगम (GMVN) और कृषि समेत कई सरकारी संस्थानों के लिए उपलब्ध जमीन का पहले ही बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया जा चुका है। उन्होंने 90 साल की लीज के बाद जमीन को अपने नाम कराने और उसी जमीन के आधार पर कारोबार के लिए ऋण लेने जैसी व्यवस्थाओं पर भी सवाल उठाए।

उन्होंने कहा कि ऐसी व्यवस्थाएं आम उत्तराखंडवासी के हित में नहीं हैं और सरकारी संपत्ति के इस्तेमाल को लेकर सरकार को जवाब देना चाहिए।

‘स्थानीय युवाओं के लिए रखी गईं मुश्किल शर्तें’

कांग्रेस चार्जशीट कमेटी के अध्यक्ष ने आरोप लगाया कि जमीन लेने के लिए ऐसी शर्तें निर्धारित की गई हैं, जिनके चलते स्थानीय युवा और छोटे कारोबारी प्रतिस्पर्धा से बाहर हो जाते हैं।

माहरा के मुताबिक, आवेदक के पास करीब 60 करोड़ रुपये की नेटवर्थ, 25 से अधिक देशों में कारोबार और होटल के मामले में एक हजार कमरों के संचालन का अनुभव जैसी शर्तें रखी गई हैं।

उन्होंने कहा कि इन शर्तों से स्थानीय युवाओं के लिए अवसर सीमित हो जाते हैं। माहरा ने आरोप लगाया कि सरकार बड़ी बाहरी कंपनियों को फायदा पहुंचाने की दिशा में काम कर रही है।

डाबा माइनर की जमीन को लेकर कांग्रेस का बड़ा दावा

कांग्रेस ने डाबा माइनर क्षेत्र में करीब 1.5 लाख वर्ग मीटर सरकारी जमीन के आवंटन को लेकर भी सवाल उठाए। करन माहरा ने दावा किया कि यह जमीन महज 37.65 लाख रुपये में पेट्रोलियम मंत्रालय को दे दी गई।

उन्होंने कहा कि यदि सरकार को जमीन आवंटित करनी ही थी तो प्रक्रिया पारदर्शी तरीके से नीलामी के जरिए होनी चाहिए थी, जिससे राज्य को अधिक राजस्व मिल सकता था। कांग्रेस का दावा है कि संबंधित भूमि की बाजार दर करीब 1.50 करोड़ रुपये प्रति बीघा बताई जा रही है।

माहरा ने कहा कि यदि जमीन को करीब एक करोड़ रुपये प्रति बीघा की दर से भी बेचा जाता तो सरकार को लगभग 360 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त हो सकता था।

36 बीघा जमीन के मूल्यांकन पर भी सवाल

कांग्रेस ने एक अन्य भूमि आवंटन का हवाला देते हुए दावा किया कि करीब 36 बीघा जमीन 128.36 करोड़ रुपये में दी गई थी। इसके महज तीन महीने बाद किए गए रिवाइज्ड आकलन में जमीन की कीमत करीब 254 करोड़ रुपये तक पहुंच गई।

माहरा ने आरोप लगाया कि दोनों मूल्यांकनों के बीच करीब 125 करोड़ रुपये का अंतर है और इससे सरकारी खजाने को नुकसान हुआ है।

उन्होंने कहा कि सरकार एक ओर प्रदेश में उद्योग और औद्योगिक प्लॉट विकसित करने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर सरकारी जमीनों को कम कीमत पर दिए जाने के मामलों को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं।

कांग्रेस ने की निष्पक्ष जांच की मांग

कांग्रेस ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने और सरकारी जमीनों के आवंटन में पूरी पारदर्शिता सुनिश्चित करने की मांग की। करन माहरा ने कहा कि सरकारी जमीन केवल मौजूदा सरकार की संपत्ति नहीं है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों की भी धरोहर है।

कांग्रेस नेताओं ने सरकार से जमीन आवंटन की प्रक्रिया, मूल्यांकन और उससे राज्य को हुए राजस्व लाभ या नुकसान का पूरा ब्योरा सार्वजनिक करने की मांग की।