उत्तराखंड: ठेके पर कटेंगे पेड़? नई व्यवस्था पर अफसरों और विभाग में छिड़ा टकराव

देहरादून: उत्तराखंड वन विकास निगम में पेड़ों के कटान और विदोहन की मौजूदा व्यवस्था में बदलाव की तैयारी ने अधिकारियों के बीच मतभेद पैदा कर दिए हैं। वन निगम के श्रमिकों से पेड़ों का कटान कराने के बजाय अब यह काम ठेकेदारी व्यवस्था के तहत कराने की योजना है। हालांकि, महाप्रबंधक कुमाऊं ने इस व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए वन निगम की प्रबंध निदेशक को पत्र भेजा है। पत्र में नई व्यवस्था से पैदा होने वाली व्यावहारिक दिक्कतों और वन क्षेत्र में अनियमितता की आशंका का उल्लेख किया गया है।
वन विभाग रोटेशन के आधार पर काटे जाने वाले पेड़ों को चिन्हित करता है और संबंधित लॉट वन निगम को सौंपता है। इसके बाद निगम अपने श्रमिकों के माध्यम से पेड़ों का कटान कराता है। कटे हुए पेड़ों को डिपो तक पहुंचाने और ढुलान का काम निजी क्षेत्र के माध्यम से कराया जाता है।
अब इस व्यवस्था में बदलाव की तैयारी है। 20 जुलाई को वन विकास निगम के प्रबंध निदेशक ने महाप्रबंधक गढ़वाल, कुमाऊं और संबंधित आरएम को पत्र भेजकर कटान और विदोहन का कार्य जुलाई 2025 की संशोधित दरों पर कराने के निर्देश दिए थे। साथ ही आवंटित वृक्षों के विदोहन और ढुलान का काम पारदर्शी निविदा प्रक्रिया के जरिए कराने को कहा गया था।
महाप्रबंधक कुमाऊं ने अपने पत्र में वर्ष 2006 के महाप्रबंधक के आदेश का हवाला दिया है। इसमें वृक्षों का पातन, कटान और चिरान विभागीय स्तर पर कराने, जबकि प्रकाष्ठ ढुलान श्रमिकों के व्यवस्थापकों के माध्यम से कराने की व्यवस्था थी।
पत्र में आरएम रामनगर और कुमाऊं के पत्रों का भी उल्लेख करते हुए कहा गया है कि आरक्षित वन क्षेत्र में कटान, मुछान, आफ रोड ढुलान और लौपिंग जैसे कार्य निविदा के माध्यम से कराने पर फील्ड स्तर पर निगम का नियंत्रण कम हो सकता है।
अधिकारी के मुताबिक बाहरी निविदादाता अपनी सुविधा और जरूरत के अनुसार काम कर सकते हैं। इससे वन क्षेत्र में अनियमितता की आशंका बढ़ सकती है।
महाप्रबंधक कुमाऊं ने यह भी आशंका जताई है कि बाहरी ठेकेदार को कटान का काम सौंपने पर मौके पर वास्तविक पेड़ों की पहचान और निर्धारित पेड़ों का ही कटान सुनिश्चित करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
इसके अलावा अनाधिकृत कटान रोकने और मौके पर जवाबदेही तय करने में भी कठिनाई आ सकती है। यदि किसी तरह की शिकायत या अवैध कटान की स्थिति सामने आती है तो उसकी जवाबदेही वन निगम पर प्रभावित होने की संभावना जताई गई है।
पत्र में यह भी कहा गया है कि लगातार बाहरी व्यक्तियों को काम सौंपने से वन निगम की तकनीकी दक्षता और फील्ड स्तर पर नियंत्रण धीरे-धीरे सीमित हो सकता है।
महाप्रबंधक कुमाऊं ने सुझाव दिया है कि विदोहन और पातन का कार्य वन निगम के माध्यम से ही कराया जाना अधिक उचित होगा। नई व्यवस्था लागू करने से पहले विधिक और तकनीकी परीक्षण समिति गठित कर पूरे प्रस्ताव की समीक्षा करने की बात कही गई है।
अधिकारी का मानना है कि इस समीक्षा के बाद ही यह तय किया जाना चाहिए कि किन कार्यों को निविदा के जरिए कराया जाए और किन कार्यों पर निगम का प्रत्यक्ष नियंत्रण बनाए रखा जाए।
वन विकास निगम की प्रबंध निदेशक नीना ग्रेवाल ने कहा कि कई बार गड़बड़ी की शिकायतें सामने आती हैं। इसी वजह से पारदर्शी व्यवस्था के तहत निविदा के माध्यम से कार्य कराने का निर्णय लिया गया है। उनके मुताबिक गढ़वाल में इस माध्यम से काम किया भी जा रहा है।
उन्होंने कहा कि महाप्रबंधक कुमाऊं ने व्यवस्था में शिथिलीकरण का प्रस्ताव दिया है और उनके प्रस्ताव पर विचार किया जाएगा। जहां निविदा के माध्यम से कार्य कराने में व्यावहारिक दिक्कतें आ रही हैं, वहां भी विचार किया जाएगा।
