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गणपति के भोग की थाली: मोदक, साबूदाना खिचड़ी, श्रीखंड और नारियल बर्फी घर पर ऐसे बनाएँ

16 September 2026
गणपति के भोग की थाली: मोदक, साबूदाना खिचड़ी, श्रीखंड और नारियल बर्फी घर पर ऐसे बनाएँ

नई दिल्ली: गणेश उत्सव के दिनों में घर की रसोई का पूरा दिन भोग की थाली के इर्द-गिर्द घूमता है। परंपरा में हर दिन के लिए कोई न कोई मीठा या सादा पकवान तय रहता है, और इनमें से ज्यादातर ऐसे हैं जिन्हें बिना किसी खास तैयारी के घर पर बनाया जा सकता है।

सबसे ऊपर मोदक आता है, जिसे बप्पा का सबसे प्रिय भोग माना जाता है। इसके भरावन के लिए ताजा कसा नारियल और गुड़ धीमी आँच पर तब तक भूने जाते हैं जब तक मिश्रण गाढ़ा न हो जाए। ऊपरी परत चावल के आटे से बनती है, जिसे गर्म पानी में गूँथकर नरम रखा जाता है। भरावन भरने के बाद मोदक को करीब दस से बारह मिनट भाप में पकाया जाता है।

जिनके पास भाप में पकाने का समय या साँचा नहीं है, उनके लिए तला हुआ मोदक दूसरा रास्ता है। इसमें आटे की लोई थोड़ी सख्त गूँथी जाती है और भरावन भरने के बाद मध्यम आँच पर सुनहरा होने तक तला जाता है। तले हुए मोदक कई दिन तक चलते हैं, इसलिए इन्हें पहले से बनाकर रखा जा सकता है।

बाकी दिनों के लिए तीन आसान विकल्प

  • साबूदाना खिचड़ी: साबूदाने को कुछ घंटे भिगोकर रखें, ताकि दाने आपस में चिपकें नहीं। मूँगफली का दरदरा पाउडर, उबला आलू और सेंधा नमक मिलाकर हल्की आँच पर पकाएँ। यह व्रत रखने वालों के लिए भी उपयुक्त रहती है।
  • श्रीखंड: गाढ़े दही को कपड़े में बाँधकर कुछ घंटे लटका दें, ताकि सारा पानी निकल जाए। बचे हुए गाढ़े हिस्से में पिसी चीनी और इलायची मिलाकर फेंटें और ठंडा करके परोसें।
  • नारियल बर्फी: कसे हुए नारियल को दूध या मावा के साथ पकाकर गाढ़ा करें, चीनी मिलाएँ और थाली में जमा दें। ऊपर से कटे मेवे डालकर चौकोर टुकड़ों में काट लें।

भोग बनाते समय क्या ध्यान रखें

प्रसाद के लिए इस्तेमाल होने वाले बर्तन अलग रखे जाते हैं और सामग्री ताजा होनी चाहिए। गुड़ और नारियल की मात्रा स्वाद के हिसाब से घटाई-बढ़ाई जा सकती है, लेकिन मिश्रण को जरूरत से ज्यादा पकाने पर वह सख्त हो जाता है, इसलिए आँच धीमी रखना ही बेहतर है।

पाँचों दिन अलग-अलग पकवान बनाने की कोई बाध्यता नहीं है। कई घरों में पहले और आखिरी दिन मोदक बनता है और बीच के दिनों में सादा प्रसाद रखा जाता है। मात्रा परिवार के हिसाब से तय करें, क्योंकि प्रसाद बच जाने पर उसे सहेजना भी उतनी ही जिम्मेदारी का काम है।