आईक्यू और ईक्यू के बाद अब एसक्यू की बारी, दफ्तरों में बढ़ रही आध्यात्मिक समझ की मांग

नई दिल्ली: किसी व्यक्ति की योग्यता मापने का पहला पैमाना लंबे समय तक आईक्यू यानी बौद्धिक क्षमता रहा। फिर ईक्यू यानी भावनात्मक समझ को अहमियत मिली, क्योंकि टीम के साथ काम करने और संवाद बनाए रखने में यही काम आती है। अब चर्चा एक तीसरे पैमाने की है, जिसे एसक्यू यानी आध्यात्मिक समझ कहा जा रहा है।
इसकी जरूरत इसलिए महसूस की जा रही है कि तेज दिमाग और परिष्कृत भावनात्मक समझ रखने वाले कई नेतृत्वकर्ता भी तनाव, थकान, दफ्तर की खींचतान और नैतिक चूक जैसी स्थितियों से जूझते दिखते हैं। जानकारों का मानना है कि यही वह खाली जगह है जिसे एसक्यू भरता है, क्योंकि वह यह तय करने में मदद करता है कि क्षमता का उपयोग किस दिशा में किया जाए।
भारतीय परंपरा में पुरानी सोच
यह विचार भारतीय परंपरा के लिए नया नहीं है। चाणक्य ने अर्थशास्त्र में इंद्रिय-जय यानी स्वयं पर नियंत्रण को शासन की पहली शर्त बताया था। उनका प्रसिद्ध सूत्र है, प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्, यानी राजा का सुख प्रजा के सुख में है। उनका मानना था कि आत्मसंयम के बिना तेज बुद्धि केवल भ्रष्टाचार और अहंकार को बढ़ाती है।
न्याय दर्शन भी इसी दिशा में संकेत करता है। उसमें तर्क का उद्देश्य बहस जीतना नहीं, बल्कि सत्य तक पहुंचना और लोकहित करना बताया गया है। प्रशासन को केवल फाइलें आगे बढ़ाने का काम नहीं, बल्कि लोकसंग्रह और राजधर्म के रूप में देखा गया है।
काम पर क्या असर पड़ता है
- संकट में संतुलन: गीता का सूत्र योगस्थः कुरु कर्माणि और समत्वं योग उच्यते कठिन परिस्थिति में स्थिर रहने की सीख देता है।
- बेहतर उत्पादकता: योगः कर्मसु कौशलम् यानी काम में कुशलता ही योग है, जो एकाग्रता से आती है।
- स्वस्थ कार्यसंस्कृति: आपसी टकराव घटता है और टीम में भरोसा बढ़ता है।
- स्वास्थ्य: लगातार तनाव से होने वाली नींद की कमी और रक्तचाप जैसी दिक्कतों से बचाव में मदद।
कामकाजी जीवन में सबसे बड़ी थकान अक्सर काम की मात्रा से नहीं, बल्कि लगातार बनी रहने वाली मानसिक उथल-पुथल से आती है। जो लोग अपने भीतर संतुलन बनाए रखना सीख लेते हैं, वे दबाव के क्षणों में जल्दबाजी में फैसले लेने से बच जाते हैं।
एसक्यू का अर्थ किसी विशेष पूजा पद्धति से नहीं, बल्कि आत्मसंयम, स्पष्ट उद्देश्य और दूसरों के प्रति जिम्मेदारी की समझ से है। यही कारण है कि कई संस्थान अब नेतृत्व प्रशिक्षण में केवल तकनीकी कौशल नहीं, बल्कि संयम और नैतिक विवेक से जुड़े विषय भी जोड़ रहे हैं।
