भारत-नेपाल मैत्री पुल पर क्यों छिड़ा विवाद? उद्घाटन से पहले साइनबोर्ड पर चढ़ी काली पन्नी, जानें पूरा मामला

- विवाद की वजह: 'वेलकम टू नेपाल' बोर्ड पर नेपाली क्षेत्र 'असिगड़ा' की जगह लिख दिया गया था भारत का 'छारछुम' गांव
- नेपाल का एतराज: स्थानीय लोगों और राजनीतिक दलों ने नेपाल के विदेश मंत्रालय तक शिकायत दर्ज कराई
- अधिकारियों का फैसला: पीडब्ल्यूडी ने विवादित नाम को ढका, जल्द नया साइनबोर्ड लगाया जाएगा
पिथौरागढ़ (उत्तराखंड)।
भारत और नेपाल के सीमांत क्षेत्र को सड़क मार्ग से जोड़ने के लिए तैयार हुए ऐतिहासिक 'भारत-नेपाल मैत्री सेतु' पर वाहनों की आवाजाही शुरू होने से पहले ही नया विवाद खड़ा हो गया है। विवाद की वजह पुल पर नेपाल की सीमा की तरफ लगाया गया एक साइनबोर्ड (स्वागत पट्ट) है।
दरअसल, नेपाल की सीमा में लगे 'वेलकम टू नेपाल' बोर्ड पर नेपाली क्षेत्र के बजाय भारतीय गांव 'छारछुम' का नाम लिख दिया गया था। नेपाली नागरिकों और वहां के राजनीतिक दलों की कड़ी आपत्ति के बाद आनन-फानन में साइनबोर्ड पर लिखे नाम को काली पन्नी से ढक दिया गया है।
करीब 32.98 करोड़ रुपये की लागत से बने इस 110 मीटर लंबे मोटर पुल का पूरा खर्च भारत सरकार ने उठाया है। निर्माण कार्य पूरा हो चुका है, लेकिन कस्टम और सुरक्षा एजेंसियों के भवनों का काम अंतिम चरण में होने के कारण अभी इस पर वाहनों का संचालन शुरू नहीं हुआ है।
विवाद की असली वजह क्या है?
काली नदी पर बने इस मोटर पुल का एक छोर भारत के पिथौरागढ़ जिले की धारचूला तहसील के 'मल्ला छारछुम' में है, जबकि दूसरा छोर नेपाल के दार्चुला जिले की 'महाकाली नगर पालिका वार्ड-8, असिगड़ा' से जुड़ता है।
पुल निर्माण के बाद नेपाल की सीमा वाले छोर पर एक स्वागत बोर्ड लगाया गया, जिस पर लिखा था— 'वेलकम टू नेपाल - काली नदी, छारछुम'।
नेपाल के स्थानीय लोगों और राजनीतिक दलों ने इस पर तीखा विरोध जताते हुए कहा कि जब यह जमीन नेपाल की है, तो वहां भारतीय गांव छारछुम का नाम क्यों लिखा गया? नेपाल पक्ष का कहना था कि बोर्ड पर उनके क्षेत्र यानी 'महाकाली नगर पालिका-8, असिगड़ा (दार्चुला)' का नाम दर्ज होना चाहिए। यह मामला नेपाल के परराष्ट्र मंत्रालय (विदेश मंत्रालय) और स्थानीय जिला प्रशासन तक भी पहुंच गया। स्थिति को बिगड़ता देख भारतीय निर्माण एजेंसी ने नाम पर काली पन्नी लगा दी।
अधिकारी का बयान
"नेपाली पक्ष की आपत्ति सामने आने के बाद फिलहाल साइनबोर्ड पर लिखे नाम को काली पन्नी से ढक दिया गया है। इस बोर्ड को जल्द ही वहां से हटा दिया जाएगा और दोनों पक्षों की सहमति के अनुसार नया बोर्ड स्थापित किया जाएगा।"
— हेम पांडेय, सहायक अभियंता (AE), लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी)
क्यों बेहद अहम है यह मोटर पुल?
200 किलोमीटर का चक्कर बचेगा
अब तक पिथौरागढ़ जिले से नेपाल में गाड़ियां ले जाने के लिए कोई सीधा मोटर पुल मौजूद नहीं था। स्थानीय लोगों और व्यापारियों को वाहन लेकर नेपाल जाने के लिए करीब 200 किलोमीटर दूर चंपावत जिले के 'बनबसा' बॉर्डर का चक्कर लगाना पड़ता था। छारछुम पुल शुरू होने से समय और ईंधन दोनों की भारी बचत होगी।
दोनों देशों के बीच व्यापार को नई रफ्तार
धारचूला से नेपाल के सीमावर्ती इलाकों तक सीधा सड़क संपर्क स्थापित होने से भारत और नेपाल के बीच स्थानीय व्यापार और पर्यटन गतिविधियों में बड़ा उछाल आने की उम्मीद है।
275 किमी लंबी सीमा पर पहला आधुनिक विकल्प
पिथौरागढ़ जिले की नेपाल के साथ करीब 275 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा लगती है। अब तक सीमा पर दोनों देशों के नागरिकों की पैदल आवाजाही के लिए 10 अंतरराष्ट्रीय झूलापुल (सस्पेंशन ब्रिज) ही सहारा थे। यह नया पुल दोनों मुल्कों के बीच वाहनों के लिए एक मजबूत और सीधा लाइफलाइन बनेगा।
प्रोजेक्ट फैक्ट फाइल: एक नजर में
- पुल की लंबाई: 110 मीटर
- नदी: काली (महाकाली) नदी
- कुल लागत: ₹32 करोड़ 98 लाख (भारत सरकार द्वारा शत-प्रतिशत अनुदान)
- समझौता (MoU): फरवरी 2022 में भारत और नेपाल के बीच हुआ था
- शिलान्यास: सितंबर 2022
- वर्तमान स्थिति: पुल का ढांचा तैयार; सुरक्षा और कस्टम चेकपोस्ट बनते ही आवाजाही शुरू होगी।
