हिमालय दिवस पर देहरादून की सड़कों से गूंजी पहाड़ों के संरक्षण की आवाज: बच्चों ने थामी तख्तियां, पर्यावरणविदों ने उठाया 'जलवायु अन्याय' का मुद्दा

देहरादून: हिमालय सिर्फ बर्फ से ढकी चोटियों की श्रृंखला नहीं, बल्कि देश के करोड़ों लोगों के जीवन, जल, जंगल और भविष्य की प्राणवायु है। लेकिन तथाकथित विकास की अंधी दौड़, अंधाधुंध कटते पहाड़ और पेड़ों के विनाश ने इस संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर संकट में डाल दिया है। 'हिमालय दिवस' के अवसर पर इसी चिंता को लेकर पर्यावरणविद्, सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी और स्कूली बच्चे देहरादून की सड़कों पर उतरे और हिमालय के अस्तित्व को बचाने के लिए जोरदार जनजागरूकता अभियान चलाया।
परेड ग्राउंड के समीप 'सिटिजन्स फॉर ग्रीन दून' सहित कई सामाजिक संगठनों द्वारा आयोजित इस प्रदर्शन में बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं, सड़कों के नाम पर पहाड़ों की अनियंत्रित कटिंग और बढ़ते मानवीय दबाव पर तीखे सवाल उठाए गए।
कार्यक्रम का सबसे भावुक और प्रभावी दृश्य तब देखने को मिला जब छोटे-छोटे बच्चे हाथों में तख्तियां लेकर खड़े नजर आए। बच्चों की तख्तियों पर लिखा था— 'हिमालय रहेगा, तभी जीवन बचेगा' और 'आने वाली पीढ़ियों के लिए पहाड़ बचाओ'!। बच्चों ने संदेश दिया कि हिमालय का अस्तित्व सिर्फ आज का नहीं, बल्कि आने वाले कल और भविष्य की पीढ़ियों का सवाल है।
इस दौरान कलाकारों द्वारा प्रस्तुत नुक्कड़ नाटक ने दर्शकों को झकझोर कर रख दिया। नाटक के जरिए दिखाया गया कि पहाड़ों के विनाश के लिए केवल किसी एक वर्ग को दोषी नहीं ठहराया जा सकता; इसमें नीति-निर्माताओं की अदूरदर्शिता, अधिकारियों की लापरवाही, पर्यटकों की गैर-जिम्मेदाराना हरकतें और स्थानीय स्तर पर बढ़ता लालच बराबर के जिम्मेदार हैं।
सिटिजन्स फॉर ग्रीन दून के संस्थापक और पर्यावरण कार्यकर्ता हिमांशु अरोड़ा ने प्रतीकात्मक आयोजनों पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा, "हिमालय दिवस या हरेला पर्व के नाम पर साल में सिर्फ एक दिन रस्म अदायगी करना और बाकी के 364 दिन जंगलों व पहाड़ों पर कुल्हाड़ी चलाना बंद होना चाहिए। यदि वास्तव में हिमालय को बचाना है, तो पेड़ों के कटान पर पूरी तरह से रोक लगानी होगी। उत्तराखंड से यदि हिमालय का प्राकृतिक स्वरूप ही छिन गया, तो इस राज्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती।"
वरिष्ठ समाजसेवी अनूप नौटियाल ने 'क्लाइमेट इनजस्टिस' (जलवायु अन्याय) का गंभीर मुद्दा उठाते हुए कहा कि हिमालय दुनिया के सबसे बड़े मीठे पानी (Freshwater) के स्रोतों में शामिल है, लेकिन आज यह उस कार्बन उत्सर्जन और ग्लोबल वार्मिंग की भारी कीमत चुका रहा है, जिसके लिए वह खुद जिम्मेदार नहीं है।
उन्होंने कहा, "उत्तराखंड का कार्बन उत्सर्जन देश के अन्य राज्यों की तुलना में बेहद कम है, फिर भी आपदाओं का सबसे बड़ा दंश यहां के पहाड़ों और ग्रामीणों को झेलना पड़ रहा है। आने वाले चुनावों में हिमालय और उसके निवासियों के साथ हो रहे इस जलवायु अन्याय को प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाया जाना चाहिए।"
वरिष्ठ इतिहासकार डॉ. लोकेश ओहरी ने आगाह करते हुए कहा कि हिमालय के क्षरण का असर केवल ऊंचे पहाड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि मैदानी और तराई क्षेत्रों में भी तबाही के रूप में दिखने लगा है। शिवालिक श्रेणी के बीच बसी दून घाटी, जो गंगा और यमुना के प्रवाह क्षेत्र से घिरी है, अब लगातार बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं के सीधे खतरे में है।
प्रदर्शनकारियों ने एक सुर में संकल्प दोहराया— "हिमालय केवल हमारी विरासत नहीं, हमारी सामूहिक जिम्मेदारी भी है।" हिमालय दिवस पर उठी यह आवाज नीति-निर्माताओं को यह याद दिलाने के लिए काफी है कि अगर पहाड़ नहीं बचे, तो मैदानों का अस्तित्व भी सुरक्षित नहीं रहेगा।
