गांव की बेटियों को स्कूल लौटाने वाली शिक्षिका को राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार

नासिक: महाराष्ट्र के नासिक में महानगरपालिका के एक स्कूल में पढ़ाने वाली शिक्षिका कुंदा बच्छाव का चयन इस साल के राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार के लिए हुआ है। क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले विद्यामंदिर में पढ़ाने वाली कुंदा ने उस धारणा को बदलने का काम किया है, जिसके तहत माना जाता है कि नगर निगम के स्कूलों में पढ़ाई कमजोर होती है।
कुंदा ने पढ़ाई को किताबों तक सीमित रखने के बजाय खेल, प्रयोग और कहानियों के जरिये सिखाने का तरीका अपनाया। जो बच्चे पढ़ाई में पीछे रह गए थे, उनके लिए उन्होंने कक्षा में एक निपुण कॉर्नर बनाया, जहां हर बच्चा अपनी गति से सीख सकता है। इससे कमजोर बच्चों पर दूसरों के साथ दौड़ने का दबाव खत्म हुआ।
बच्चे ही बने एक-दूसरे के शिक्षक
कक्षा में उन्होंने अडॉप्ट अ फ्रेंड नाम की पहल शुरू की, जिसमें बेहतर समझ रखने वाले बच्चे अपने साथी को पढ़ाने की जिम्मेदारी लेते हैं। इस तरीके से पढ़ाने वाले बच्चे का विषय पर पकड़ मजबूत होती है और सीखने वाले बच्चे की झिझक भी दूर होती है।
संविधान जैसे कठिन विषय को आसान बनाने के लिए उन्होंने संविधान सांप-सीढ़ी नाम का खेल तैयार किया। खेल-खेल में बच्चे अधिकारों और कर्तव्यों को समझ जाते हैं। इस तरीके की चर्चा दूसरे स्कूलों तक भी पहुंची।
कोरोना में मिली सबसे बड़ी चुनौती
कोविड-19 के दौरान जब स्कूल बंद थे, कुंदा ने घर-घर जाकर सर्वेक्षण किया। इस दौरान उन्हें ऐसी कई लड़कियां मिलीं जिनकी पढ़ाई बीच में छूट गई थी या जिनका विवाह कर दिया गया था। इसी अनुभव से उन्होंने एजुकेशनल गार्डियनशिप की शुरुआत की।
- शुरुआत: वर्ष 2021 में सिर्फ पांच लड़कियों के साथ पहल शुरू की गई।
- आज: इस पहल से जुड़ी 150 लड़कियां उच्च शिक्षा हासिल कर रही हैं।
- तरीका: खेल, प्रयोग और कहानियों के जरिये पढ़ाई, निपुण कॉर्नर और साथी शिक्षण।
पांच लड़कियों से शुरू हुई यह पहल आज 150 लड़कियों तक पहुंच चुकी है, जो आगे की पढ़ाई कर रही हैं। शिक्षा से जुड़े लोगों का मानना है कि सरकारी और निगम स्कूलों में ऐसे प्रयोगों को बढ़ावा मिले तो बीच में पढ़ाई छोड़ने वाली लड़कियों की संख्या में बड़ा बदलाव लाया जा सकता है।
