उत्तराखंड में ग्लेशियर झीलों का सर्वे: सरस्वती ताल 700 मीटर लंबी, 30 मीटर गहरी; केदारताल इससे आधी... खतरे से निपटने को लगेंगे अर्ली वार्निंग सिस्टम

देहरादून: उत्तराखंड की हिमनद झीलों को लेकर किए जा रहे अध्ययन में सरस्वती ताल से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई है। हाल ही में सरस्वती ताल और केदारताल का अध्ययन करने पहुंची विशेषज्ञ टीम ने पाया कि सरस्वती ताल की लंबाई करीब 700 मीटर, चौड़ाई 300 मीटर और गहराई लगभग 30 मीटर है। टीम के अनुसार, झील से पानी की निकासी भी हो रही है।
उत्तराखंड आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (USDMA) राज्य की संवेदनशील हिमनद झीलों का अध्ययन करा रहा है। अध्ययन के दौरान टीम को दोनों झीलों के जल निकासी मार्ग भी मिले हैं। विशेषज्ञों ने झीलों की भौगोलिक स्थिति, घाटी की संरचना और आसपास के आबादी वाले क्षेत्रों का भी जायजा लिया।
सरस्वती ताल की घाटी अधिक चौड़ी
अध्ययन में सामने आया कि सरस्वती ताल की घाटी तुलनात्मक रूप से अधिक चौड़ी है, जबकि केदारताल की घाटी अपेक्षाकृत संकरी है। टीम के प्रारंभिक आकलन के अनुसार, केदारताल का आकार सरस्वती ताल की तुलना में करीब आधा है।
दोनों झीलें मोरेन डैम से बनी झीलें हैं। मोरेन डैम ग्लेशियर के पीछे हटने के दौरान जमा हुए चट्टानी मलबे और अन्य सामग्री से बनने वाले प्राकृतिक बांध होते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे प्राकृतिक बांधों के कारण बनी झीलों में पानी का दबाव बढ़ने पर जोखिम की स्थिति पैदा हो सकती है।
दोनों क्षेत्रों में ग्लेशियर पिघलने की स्थिति
केदारताल के पास स्थित केदारबमक ग्लेशियर के पिघलने की स्थिति का भी टीम ने अध्ययन किया। वहीं, सरस्वती ताल के आसपास मौजूद ग्लेशियर की स्थिति का भी आकलन किया गया। टीम ने दोनों स्थानों पर अर्ली वार्निंग सिस्टम और ऑल-वेदर स्टेशन स्थापित करने के लिए संभावित स्थलों का निरीक्षण किया है।
कई संस्थाएं अध्ययन में शामिल
इस अध्ययन में यूएलएमएमसी, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी (NIH), बीएसआईपी, वाडिया संस्थान और एसडीआरएफ की टीमें शामिल रहीं। यूएसडीएमए के सहयोग से राज्य की हिमनद झीलों में अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने की भी तैयारी की जा रही है।
सरस्वती ताल तक पहुंचना रहा चुनौतीपूर्ण
सरस्वती ताल तक पहुंचने में टीम को काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। वहां ट्रैकिंग के लिए कोई निश्चित मार्ग नहीं था। ऐसे में एक दिन पहले एक टीम ने संभावित मार्ग का अनुमान लगाया और अगले दिन पूरी टीम उसी मार्ग से झील तक पहुंची।
आपदा प्रबंधन विभाग के सचिव विनोद कुमार सुमन ने बताया कि अध्ययन टीम की विस्तृत रिपोर्ट अभी प्राप्त नहीं हुई है। रिपोर्ट मिलने के बाद ही दोनों झीलों की वास्तविक स्थिति और संभावित जोखिम को लेकर स्पष्ट जानकारी सामने आ सकेगी।
