विश्वकर्मा पूजा 17 सितंबर को, जानें औजारों की पूजा का महत्व और तीन सरल उपाय

वाराणसी: सृष्टि के पहले शिल्पी माने जाने वाले भगवान विश्वकर्मा की पूजा इस साल गुरुवार 17 सितंबर को की जाएगी। यह तिथि उस दिन पड़ती है जब सूर्य सिंह राशि से निकलकर कन्या राशि में प्रवेश करते हैं, इसलिए इसे कन्या संक्रांति भी कहा जाता है।
इस दिन की परंपरा बाकी त्योहारों से अलग है। यहाँ पूजा का केंद्र औजार, मशीनें और वाहन होते हैं। कारखानों, वर्कशॉप, गैराज और छोटी दुकानों में काम रोककर मशीनों की सफाई की जाती है, उन पर तिलक लगाया जाता है और फूल चढ़ाए जाते हैं। कई जगहों पर इस दिन उत्पादन बंद रहता है, क्योंकि मान्यता है कि औजार उस दिन विश्राम पर रहते हैं।
तीन उपाय, जो घर और दुकान दोनों के लिए बताए जाते हैं
- जल का कलश: भगवान विश्वकर्मा के चित्र या प्रतिमा के सामने साफ पानी से भरा कलश रखें, उसमें चाँदी का सिक्का डालें, ऊपर लाल कपड़ा ढककर कलावा बाँधें और इसे घर के पूर्व दिशा वाले हिस्से में स्थापित करें।
- लाल कपड़े की पोटली: एक लाल कपड़े में चार लौंग, चार कपूर, चार चाँदी के या एक रुपये के सिक्के और चार मुट्ठी चावल बाँधकर पोटली बनाएँ और उसे दुकान की तिजोरी या गल्ले में रखें।
- घर के लिए संकल्प: अपना घर बनाने की इच्छा रखने वालों के लिए कहा जाता है कि आटे से घर की आकृति बनाकर भगवान के सामने रखें और ॐ आधार शक्तये नमः मंत्र का जाप करें।
पूजा में क्या-क्या शामिल होता है
पूजा से पहले काम की जगह की सफाई सबसे जरूरी मानी जाती है। इसके बाद औजारों को एक जगह सजाकर रखा जाता है, उन पर हल्दी और रोली से तिलक किया जाता है और धूप-दीप के साथ आरती होती है। कई प्रतिष्ठानों में इस मौके पर सामूहिक भोज भी रखा जाता है, जिसमें कर्मचारी और उनके परिवार शामिल होते हैं।
मान्यता है कि यह दिन काम करने वाले हाथों और उन औजारों के प्रति आभार जताने का है, जिनसे रोजी-रोटी चलती है। यही वजह है कि इस पूजा की पहुँच बड़े कारखानों से लेकर सड़क किनारे की छोटी मरम्मत की दुकानों तक एक जैसी है।
