गणेश चतुर्थी की पौराणिक कथा: उबटन से बने बालक से गजानन तक, और चंद्रमा को मिले श्राप की कहानी

धर्म: गणेश चतुर्थी केवल भगवान गणेश के जन्मोत्सव का पर्व नहीं, बल्कि श्रद्धा और शुभारंभ का प्रतीक भी है। प्रथम पूज्य गणेश को विघ्नहर्ता और बुद्धि-विवेक का देवता माना जाता है। इस पर्व से जुड़ी पौराणिक कथाओं में उनके जन्म, गजानन स्वरूप और अग्रपूज्य बनने की कहानी के साथ-साथ चंद्रमा को दिए गए श्राप का भी उल्लेख मिलता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान गणेश का जन्म भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष में हुआ था। शास्त्रों में उनके जन्म को लेकर अनेक कथाएं मिलती हैं, और यही कथाएं इस पर्व की परंपराओं को विशेष महत्व प्रदान करती हैं।
माता पार्वती ने उबटन से रचा बालक
पौराणिक कथा के अनुसार एक बार माता पार्वती स्नान करने जा रही थीं। उन्होंने अपने शरीर के उबटन से एक सुंदर बालक की रचना की और उसे अपना पुत्र मानते हुए गणेश नाम दिया। स्नान के लिए जाते समय उन्होंने गणेशजी को द्वार पर पहरा देने और अपनी अनुमति के बिना किसी को भी भीतर न आने देने का आदेश दिया।
इसी दौरान भगवान शिव वहां पहुंचे। गणेशजी ने उन्हें रोकते हुए कहा कि उनकी माता भीतर स्नान कर रही हैं, इसलिए वे अंदर नहीं जा सकते। भगवान शिव ने समझाया कि पार्वती उनकी पत्नी हैं, लेकिन गणेशजी अपनी माता की आज्ञा से पीछे नहीं हटे।
विवाद बढ़ा और कट गया सिर
माता की आज्ञा का पालन करते हुए गणेशजी द्वारा रोके जाने पर विवाद बढ़ गया और क्रोधित भगवान शिव ने त्रिशूल से गणेशजी का सिर काट दिया। जब माता पार्वती को अपने पुत्र के वध का पता चला तो उन्होंने रौद्र रूप धारण कर लिया और गणेशजी को पुनर्जीवित करने की मांग की।
माता पार्वती के क्रोध से देवताओं में भी चिंता फैल गई। भगवान शिव ने उन्हें शांत करने का प्रयास किया, लेकिन वे पुत्र को जीवनदान मिलने तक नहीं मानीं। अंततः भगवान शिव ने भगवान विष्णु से ऐसे बालक का सिर लाने को कहा, जिसकी माता अपने बच्चे की ओर पीठ करके सो रही हो।
गजमुख मिलने पर कहलाए गजानन
भगवान विष्णु के आदेश पर गरुड़जी ऐसे बालक की तलाश में निकले। कथा के अनुसार उन्हें एक हथिनी अपने बच्चे की ओर पीठ करके सोती हुई मिली। गरुड़जी उस बच्चे का सिर लेकर भगवान शिव के पास पहुंचे और भगवान शिव ने गज का सिर गणेशजी के धड़ पर स्थापित कर उन्हें पुनः जीवन प्रदान किया। गज का मुख धारण करने के बाद वे गजानन कहलाए।
भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया कि संसार में होने वाली किसी भी पूजा में सबसे पहले गणेशजी की पूजा की जाएगी। तभी से किसी भी शुभ कार्य के आरंभ में गणेश पूजन की परंपरा चली आ रही है और उन्हें प्रथम पूज्य तथा विघ्नहर्ता के रूप में पूजा जाता है।
चंद्रमा के अभिमान पर मिला श्राप
गणेशजी के गजानन स्वरूप में आने और अग्रपूज्य बनने के बाद सभी देवताओं ने उनकी स्तुति की। कथा के अनुसार चंद्रमा अपने सौंदर्य पर अभिमान करते थे और गणेशजी के स्वरूप को देखकर मंद-मंद मुस्कुराने लगे। गणेशजी ने इसे अपना उपहास समझा और क्रोधित होकर चंद्रमा को श्राप दिया कि वे काले हो जाएं।
अपनी भूल का अहसास होने पर चंद्रमा ने क्षमा मांगी। तब गणेशजी ने कहा कि सूर्य के प्रकाश से चंद्रमा फिर पूर्ण प्रकाशित होंगे, लेकिन चतुर्थी का दिन उनके दंड की स्मृति के रूप में हमेशा याद किया जाएगा। इसी कथा के आधार पर गणेश चतुर्थी पर चंद्रमा के दर्शन न करने की परंपरा चली आ रही है, और इस कथा को अभिमान के त्याग का संदेश देने वाली माना जाता है।
