हरतालिका तीज व्रत कथा: माता पार्वती की कठोर तपस्या और अटूट संकल्प की वह कथा, जो पूजा में सुनी जाती है

धर्म: हरतालिका तीज का व्रत आज रखा जा रहा है। इस दिन सुहागिन महिलाएं पति की लंबी उम्र और अखंड सौभाग्य की कामना से निर्जला व्रत रखती हैं, वहीं अविवाहित युवतियां मनचाहे जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा करती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस व्रत की पूजा के दौरान व्रत कथा सुनना या पढ़ना भी उतना ही महत्वपूर्ण माना गया है।
मान्यता है कि माता पार्वती ने भी भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। पूजा में भगवान शिव, माता गौरी और भगवान गणेश की विशेष आराधना की जाती है। कहा जाता है कि माता पार्वती की तपस्या से जुड़ी यह कथा सुनने से व्रत का धार्मिक महत्व और बढ़ जाता है।
सती से पार्वती तक का जन्म
पौराणिक कथा के अनुसार माता पार्वती अपने पूर्व जन्म में सती थीं और भगवान शिव के प्रति उनका गहरा प्रेम था। पिता दक्ष के यज्ञ में हुए अपमान के बाद सती ने अपना शरीर त्याग दिया। इसके बाद उन्होंने हिमालयराज के घर पुत्री के रूप में जन्म लिया और उनका नाम पार्वती रखा गया। बाल्यकाल से ही उनके मन में भगवान शिव को पति रूप में पाने की इच्छा थी और इसी संकल्प के साथ उन्होंने तपस्या का मार्ग चुना।
नारद मुनि लाए विवाह का प्रस्ताव
समय बीतने के साथ माता पार्वती विवाह योग्य हुईं। इसी दौरान एक दिन नारद मुनि हिमालयराज के पास पहुंचे और उन्होंने माता पार्वती के लिए भगवान विष्णु से विवाह का प्रस्ताव रखा। हिमालयराज को यह प्रस्ताव अच्छा लगा और उन्होंने इसे स्वीकार करने की इच्छा जताई।
जब यह बात माता पार्वती को पता चली तो वे बहुत दुखी हुईं। उन्होंने अपनी सहेलियों को बताया कि वे भगवान शिव के अलावा किसी और को पति के रूप में स्वीकार नहीं करना चाहतीं। एक ओर पिता की इच्छा थी और दूसरी ओर उनका अपना प्रण।
सहेलियां ले गईं वन में, यहीं से पड़ा नाम
कथा के अनुसार माता पार्वती की परेशानी देखकर उनकी सहेलियां उन्हें एक घने वन में ले गईं और एक गुफा में छिपा दिया, ताकि पिता उन्हें आसानी से खोज न सकें। सखी द्वारा हर ले जाने की इसी कथा से इस व्रत का नाम हरतालिका जुड़ा हुआ माना जाता है।
गुफा में पहुंचकर माता पार्वती ने रेत से शिवलिंग बनाया और महादेव की पूजा शुरू कर दी। इसके बाद उन्होंने उन्हें पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या आरंभ की।
तपस्या से प्रसन्न होकर प्रकट हुए महादेव
तपस्या के दौरान माता पार्वती ने कई कठिनाइयों का सामना किया, लेकिन उनका संकल्प नहीं टूटा। मौसम बदले और कठिन परिस्थितियां आईं, फिर भी उन्होंने भगवान शिव का ध्यान और पूजा जारी रखी। कथा में वर्णन मिलता है कि उन्होंने लंबे समय तक कठोर व्रत करते हुए अन्न और जल तक का त्याग कर दिया।
उनकी तपस्या और अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर एक दिन भगवान शिव उनके सामने प्रकट हुए और वर मांगने को कहा। माता पार्वती ने उन्हें ही अपने पति के रूप में पाने की इच्छा प्रकट की, जिसे स्वीकार करते हुए महादेव ने उन्हें वरदान दिया। इसी कारण इस व्रत को संकल्प और निष्ठा का पर्व माना जाता है, जिसमें फल की कामना से अधिक महत्व अपने निश्चय पर अडिग रहने को दिया गया है।
