ऑस्ट्रेलिया की गुफा में मिले हजारों साल पुरानी रस्म के निशान, राख की 73 परतों ने खोला राज

मेलबर्न: दक्षिण-पूर्वी ऑस्ट्रेलिया की एक चूना-पत्थर गुफा के फर्श के नीचे दबी राख की परतों ने वह कहानी सुना दी है, जो अब तक सिर्फ मौखिक परंपरा में जिंदा थी। शोधकर्ताओं का कहना है कि गिप्सलैंड इलाके की क्लॉग्स गुफा में करीब 25 हजार साल से किसी न किसी रूप में आग जलाने की रस्म चलती रही है।
यह गुफा गुनाईकुरनाई समुदाय की पारंपरिक भूमि पर, विक्टोरिया की दक्षिणी पहाड़ियों में है। अध्ययन ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी की शोधकर्ता डॉ. एल ग्रोनो के नेतृत्व में हुआ और पत्रिका फ्रंटियर्स इन एनवायरनमेंटल आर्कियोलॉजी में प्रकाशित हुआ है। खास बात यह है कि खुदाई खुद समुदाय के अनुरोध पर हुई, ताकि अपनी परंपरा के भौतिक प्रमाण सामने आ सकें।
मिट्टी के सूक्ष्म कणों ने बताई तारीख
टीम ने गुफा के दो गड्ढों से नमूने लिए, जो डेढ़ मीटर और सवा दो मीटर गहरे थे। इनमें पौधों के सूक्ष्म कण, यानी फाइटोलिथ, मिले जो जलने के बाद भी अपना आकार बनाए रखते हैं। प्रकाशीय और कार्बन आधारित तिथि-निर्धारण विधियों से पता चला कि करीब 4,400 से 1,600 साल पहले के बीच राख की 73 अलग-अलग पतली परतें जमा हुईं।
- घास ही मुख्य ईंधन: नमूनों में 29 तरह के फाइटोलिथ मिले, जिनमें घास की हिस्सेदारी 97 प्रतिशत तक पहुँच गई। इनमें ठंडे इलाकों की घास सबसे ज्यादा थी।
- जली हुई सतह: करीब 18 प्रतिशत तक कण जले या पिघले हुए पाए गए, जो बताता है कि आग बार-बार और सीमित जगह पर जलाई जाती थी।
- खड़ा पत्थर: करीब दो हजार साल पहले वहाँ 28 सेंटीमीटर ऊँचा एक पत्थर जानबूझकर खड़ा किया गया था।
- और नीचे की परतें: गहराई में चर्बी लगी हुई, तराशी गई कैजुराइना की लकड़ियाँ मिलीं, जिन्हें रस्म से जुड़ा माना जा रहा है।
परंपरा और प्रमाण एक जगह मिले
मोनाश विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ब्रूनो डेविड के मुताबिक समुदाय की स्मृति में यह गुफा पारंपरिक जानकारों का ठिकाना रही है, जो राख का इस्तेमाल विशेष अनुष्ठानों में करते थे। शोध दल का कहना है कि खुदाई से मिले नतीजे उस मौखिक विवरण से मेल खाते हैं, जो पीढ़ियों से चला आ रहा था।
गुनाईकुरनाई लैंड ऐंड वाटर्स कॉर्पोरेशन ने यह काम इसी उम्मीद से शुरू कराया था कि विज्ञान और परंपरा को एक साथ पढ़ा जा सके। नतीजा यह है कि गुफा अब सिर्फ एक पुरातात्विक स्थल नहीं, बल्कि एक जीवित सांस्कृतिक स्मृति का प्रमाण भी मानी जा रही है।
