BREAKINGBreaking headlines from Uttar Pradesh, Uttarakhand, Delhi, and beyond.
Aaj Ka Sach
Home /mystery

शनि के दक्षिणी ध्रुव पर मिली विशाल दस भुजाओं वाली आकृति, वैज्ञानिक भी हैरान

15 September 2026
शनि के दक्षिणी ध्रुव पर मिली विशाल दस भुजाओं वाली आकृति, वैज्ञानिक भी हैरान

वाशिंगटन: शनि ग्रह ने वैज्ञानिकों के सामने एक नई पहेली रख दी है। हबल स्पेस टेलीस्कोप ने शनि के दक्षिणी ध्रुव के चारों ओर घूमती एक विशाल दस भुजाओं वाली लहरनुमा आकृति खोजी है। यह पहली बार है जब ग्रह के दक्षिणी गोलार्ध में इतनी बड़ी और नियमित आकार वाली वायुधारा देखी गई है। यह अध्ययन शोध पत्रिका साइंस एडवांसेज में प्रकाशित हुआ है।

शनि के उत्तरी ध्रुव पर मौजूद छह भुजाओं वाली विशाल आकृति दशकों से खगोलविदों को चौंकाती रही है। लेकिन दक्षिणी ध्रुव पर अब तक ऐसी कोई संरचना नहीं दिखी थी। कैसिनी अंतरिक्ष यान ने वर्ष 2004 से 2017 के बीच शनि का लंबा अध्ययन किया था, तब भी इस तरह के किसी ढांचे का कोई संकेत नहीं मिला था।

शौकिया खगोलविदों से मिला पहला सुराग

इस खोज की शुरुआत आम लोगों की नजर से हुई। शौकिया खगोलविद ट्रेवर बैरी और जीन-पॉल ओगर ने वर्ष 2024 की तस्वीरों में एक धुंधली लहरदार पट्टी देखी। इसके बाद वर्ष 2025 में जमीन से लिए गए आंकड़ों में यह आकृति दस भुजाओं वाली संरचना के रूप में उभरकर सामने आई।

इस संकेत के बाद वैज्ञानिकों ने हबल के वर्ष 2023 तक के पुराने प्रेक्षणों को दोबारा खंगाला और आकृति के विकास का पूरा क्रम तैयार किया। ये प्रेक्षण ओपल कार्यक्रम के तहत लिए गए थे, जिसके अंतर्गत हर साल बाहरी ग्रहों के वायुमंडल की तस्वीरें ली जाती हैं।

उत्तरी आकृति से अलग है यह

अध्ययन की सह-लेखक और ओपल कार्यक्रम की प्रमुख शोधकर्ता एमी साइमन ने कहा कि शनि के दक्षिणी गोलार्ध में उन्होंने ऐसा कुछ पहले कभी नहीं देखा। उनके मुताबिक उत्तरी ध्रुव की छह भुजाओं वाली आकृति चालीस साल से हर बार देखने पर मौजूद मिली है, लेकिन यह नई संरचना अलग है और ऐसा लगता है कि यह और मजबूत होती जा रही है।

अध्ययन के मुख्य लेखक बास्क कंट्री विश्वविद्यालय के अगस्तीन सांचेज-लावेगा हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार यह लहर एक तेज वायुधारा के भीतर मौजूद है और वायुमंडल की कई परतों में ऊपर तक फैली हुई है। अलग-अलग तरंगदैर्घ्य पर देखने पर इसकी स्थिति थोड़ी बदली हुई नजर आती है।

फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि यह आकृति किस वजह से बनी और कब तक टिकेगी। शोधकर्ता अब हबल और जेम्स वेब टेलीस्कोप के प्रेक्षणों तथा कंप्यूटर मॉडल की मदद से इसका अध्ययन जारी रखेंगे। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले के माइक वोंग का कहना है कि ओपल जैसे लंबी अवधि के कार्यक्रम इसीलिए जरूरी हैं, क्योंकि वे ग्रहों में आ रहे धीमे बदलावों को पकड़ पाते हैं।