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चार हजार साल पुरानी पहेली सुलझी: ब्रिटेन के विशाल पत्थर 18 किलोमीटर दूर से लाए गए थे, नई तकनीक से मिला सुराग

14 September 2026
चार हजार साल पुरानी पहेली सुलझी: ब्रिटेन के विशाल पत्थर 18 किलोमीटर दूर से लाए गए थे, नई तकनीक से मिला सुराग

लंदन: उत्तरी इंग्लैंड में खड़े विशाल प्रागैतिहासिक पत्थरों से जुड़ी एक पुरानी पहेली अब सुलझ गई है। नए अध्ययन में सामने आया है कि करीब 25 टन वजनी इन पत्थरों को कम से कम 18 किलोमीटर दूर से ढोकर यहां तक लाया गया था, और यह काम पूरी तरह सोच-समझकर किया गया चुनाव था।

बोरोब्रिज के पास स्थित इन पत्थरों को डेविल्स एरोज के नाम से जाना जाता है। ये ब्रिटेन की सबसे ऊंची बची हुई प्रागैतिहासिक पत्थर कतार हैं, जिनमें कुछ पत्थर सात मीटर तक ऊंचे हैं। समतल मैदानी इलाके में इनकी असामान्य कतार लंबे समय से शोधकर्ताओं की दिलचस्पी का विषय रही है।

पहली बार पता चला पत्थरों का स्रोत

कर्टिन यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी ऑफ यॉर्क के नेतृत्व में हुए इस अध्ययन ने पहली बार इन पत्थरों के भूगर्भीय स्रोत की सटीक पहचान की है। शोध के मुताबिक ये पत्थर उत्तरी यॉर्कशर के ब्रिमहम रॉक्स से लाए गए थे। इससे पहले माना जाता था कि इनका स्रोत अपेक्षाकृत नजदीक स्थित प्लम्पटन रॉक्स रहा होगा।

अध्ययन के मुख्य लेखक डॉ. एंथनी क्लार्क के मुताबिक पत्थर सबसे नजदीकी स्रोत से नहीं लिए गए, बल्कि 18 किलोमीटर दूर की एक चुनौतीपूर्ण भूमि से जानबूझकर चुने गए। उनका कहना है कि इतने भारी पत्थरों को इतनी दूर तक ले जाने के लिए असाधारण योजना, समन्वय और अभियांत्रिकी कौशल की जरूरत रही होगी, और संभव है कि वह स्थान उस समुदाय के लिए कोई विशेष अर्थ रखता हो।

टेप से जुटाए गए सूक्ष्म कण, स्मारक को नुकसान नहीं

शोध दल ने इसके लिए एक नई और कम हस्तक्षेप वाली तकनीक अपनाई। चिपकने वाली टेप की मदद से पत्थरों की सतह से सूक्ष्म खनिज कण एकत्र किए गए, जिससे स्मारक को कोई नुकसान नहीं पहुंचा।

  • उम्र का मिलान: इन कणों की आयु संबंधी पहचान को संभावित स्रोत स्थलों से मिलाया गया, जो ब्रिमहम रॉक्स से मेल खाई।
  • हिमनद की भूमिका नहीं: अध्ययन ने इस संभावना को खारिज कर दिया कि पत्थर हिमनद की गति से यहां पहुंचे होंगे, यानी इन्हें इंसानों ने ही जानबूझकर यहां तक पहुंचाया।

साझा विश्वास और सामूहिक श्रम की कहानी

अनुमान है कि इन पत्थरों को नवपाषाण काल के अंतिम दौर या कांस्य युग के आरंभ में, संभवतः करीब दो हजार ईसा पूर्व खड़ा किया गया था। सह-लेखक डॉ. जिम लियरी के मुताबिक यह खोज बताती है कि उस दौर के समुदायों ने सोच-समझकर अर्थपूर्ण चुनाव किए, और यह उनके परिदृश्य, साझा विश्वास तथा उल्लेखनीय परिश्रम को सामने लाती है।

शोध दल अब इसी गैर-आक्रामक तकनीक को अन्य खड़े पत्थरों पर आजमाने और लक्षित उत्खनन करने की योजना बना रहा है। पुरातत्वविदों के लिए यह तरीका इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे संरक्षित स्मारकों को छेड़े बिना उनके इतिहास तक पहुंचा जा सकता है।