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देश में बिजली उत्पादन 4.8 प्रतिशत बढ़ा, नई मांग का बड़ा हिस्सा स्वच्छ ऊर्जा से पूरा

18 September 2026
देश में बिजली उत्पादन 4.8 प्रतिशत बढ़ा, नई मांग का बड़ा हिस्सा स्वच्छ ऊर्जा से पूरा

नई दिल्ली: देश में बिजली उत्पादन लगातार बढ़ रहा है, लेकिन बिजली क्षेत्र से निकलने वाला कार्बन लगभग स्थिर बना हुआ है। वर्ष 2024 से 2026 की पहली छमाही के बीच बिजली उत्पादन करीब 4.8 प्रतिशत बढ़कर 2,059 अरब यूनिट पर पहुंच गया, जबकि इसी दौरान बिजली क्षेत्र का कार्बन उत्सर्जन लगभग जस का तस रहा।

इसकी सबसे बड़ी वजह यह रही कि बढ़ी हुई मांग का अधिकांश हिस्सा स्वच्छ ऊर्जा से पूरा किया गया। यानी नई बिजली की जरूरत के लिए देश को उसी अनुपात में कोयले पर निर्भरता नहीं बढ़ानी पड़ी। ऊर्जा क्षेत्र के लिहाज से इसे एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है।

77 गीगावाट नई सौर क्षमता

इस अवधि में देश ने 77 गीगावाट नई सौर क्षमता जोड़ी है। यही वह आधार है, जिसने बढ़ती मांग और स्थिर उत्सर्जन को एक साथ संभव बनाया। सौर ऊर्जा की लागत में आई गिरावट और बड़ी परियोजनाओं के तेजी से पूरा होने ने इस रफ्तार में भूमिका निभाई है।

हालांकि तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। इसी दौरान देश का कुल कार्बन उत्सर्जन 3.7 प्रतिशत बढ़ गया। इसकी वजह बिजली नहीं, बल्कि इस्पात, सीमेंट और दूसरे क्षेत्रों से बढ़ता उत्सर्जन रहा।

आंकड़े एक नजर में

  • बिजली उत्पादन: करीब 4.8 प्रतिशत बढ़कर 2,059 अरब यूनिट।
  • नई सौर क्षमता: इस अवधि में 77 गीगावाट जोड़ी गई।
  • बिजली क्षेत्र का उत्सर्जन: लगभग स्थिर बना रहा।
  • कुल कार्बन उत्सर्जन: 3.7 प्रतिशत की वृद्धि, मुख्य वजह इस्पात और सीमेंट जैसे क्षेत्र।

आंकड़ों का संकेत साफ है कि बिजली क्षेत्र में स्वच्छ ऊर्जा की ओर बदलाव नतीजे देने लगा है। अब असली चुनौती उन उद्योगों की है, जहां उत्पादन प्रक्रिया में ही ईंधन जलता है और जिनका उत्सर्जन घटाना तुलनात्मक रूप से कठिन माना जाता है।

बिजली की मांग का बढ़ना अपने आप में अर्थव्यवस्था की रफ्तार का संकेत माना जाता है। घरों में उपकरणों का बढ़ता इस्तेमाल, उद्योगों का विस्तार और गर्मी के लंबे मौसम में कूलिंग की जरूरत, तीनों मिलकर खपत को ऊपर ले जाते हैं। ऐसे में मांग पूरी करते हुए भी उत्सर्जन को स्थिर रख पाना आसान नहीं होता।

यही वजह है कि नई सौर क्षमता जोड़ने की रफ्तार को अहम माना जा रहा है। सौर परियोजनाएं अपेक्षाकृत कम समय में तैयार हो जाती हैं, इसलिए वे बढ़ती मांग के साथ कदम मिलाकर चल पाती हैं। आगे का सवाल यह है कि इस बिजली को चौबीसों घंटे उपलब्ध रखने के लिए भंडारण और ग्रिड का ढांचा कितनी तेजी से खड़ा होता है।