भारत की विकास दर का अनुमान बढ़ाकर सात प्रतिशत किया गया, छमाही वृद्धि 8.2 प्रतिशत रही

नई दिल्ली: भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर एक और सकारात्मक आकलन सामने आया है। वैश्विक रेटिंग संस्था मूडीज रेटिंग्स ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर का अनुमान छह प्रतिशत से बढ़ाकर सात प्रतिशत कर दिया है। संस्था ने यह संशोधन घरेलू मांग की मजबूती और बुनियादी ढांचे पर हो रहे लगातार सरकारी खर्च को देखते हुए किया है।
आंकड़े भी इसी दिशा में इशारा कर रहे हैं। कैलेंडर वर्ष 2026 की पहली छमाही में वास्तविक जीडीपी वृद्धि सालाना आधार पर बढ़कर 8.2 प्रतिशत रही, जबकि पूरे कैलेंडर वर्ष 2025 के लिए यह आंकड़ा 7.3 प्रतिशत था। यानी साल की शुरुआती छमाही में अर्थव्यवस्था ने पिछले पूरे वर्ष की औसत रफ्तार से बेहतर प्रदर्शन किया है।
किन वजहों से बढ़ा भरोसा
- निजी उपभोग: घरेलू बाजार में उपभोक्ता मांग मजबूत बनी हुई है, जो वृद्धि का सबसे बड़ा सहारा है।
- सरकारी पूंजीगत खर्च: बुनियादी ढांचे पर लगातार हो रहे खर्च से सकल स्थायी पूंजी निर्माण को बल मिल रहा है।
- निजी निवेश: आने वाले समय में निजी क्षेत्र के निवेश में सुधार की संभावना जताई गई है।
- सेवा क्षेत्र: सेवाओं का प्रदर्शन लचीला बना हुआ है और यह रोजगार तथा निर्यात दोनों में योगदान दे रहा है।
कर्ज का बोझ अब भी बड़ी चुनौती
मूडीज ने भारत की बीएए3 रेटिंग की समीक्षा के बाद कहा कि अर्थव्यवस्था की बुनियाद मजबूत होने के बावजूद लगातार ऊंचा कर्ज बोझ और ब्याज पर होने वाला भारी खर्च सबसे बड़ा जोखिम बना हुआ है। यही वह क्षेत्र है, जहां सुधार होने पर आगे रेटिंग की स्थिति पर सकारात्मक असर पड़ सकता है।
महंगाई पर नजर
संस्था का अनुमान है कि मौजूदा वित्त वर्ष में औसत महंगाई दर 4.8 प्रतिशत रह सकती है, जबकि वित्त वर्ष 2025-26 में यह 2.4 प्रतिशत के निचले स्तर पर थी। साथ ही यह चेतावनी भी दी गई है कि यदि पश्चिम एशिया में ऊर्जा की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहीं तो महंगाई इस अनुमान से ऊपर जा सकती है।
उधर ब्रोकरेज कंपनी जेफरीज ने भी अर्थव्यवस्था को लेकर उम्मीद जताई है और कहा है कि नाममात्र जीडीपी वृद्धि 11 से 12 प्रतिशत के दायरे में रह सकती है। कंपनी ने इसके पीछे घरेलू मांग की मजबूती, बैंक ऋण में आई तेजी और आर्थिक गतिविधियों में हो रहे सुधार को वजह बताया है।
अनुमान में एक प्रतिशत अंक की यह बढ़ोतरी छोटी नहीं मानी जाती, क्योंकि इतने बड़े आकार की अर्थव्यवस्था में एक प्रतिशत का अंतर उत्पादन, रोजगार और निवेश तीनों पर दिखाई देता है। निवेशकों के लिहाज से भी ऐसे संशोधन भरोसे का संकेत माने जाते हैं।
