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डच पुस्तकालय में मिला ओडिसी का 1700 साल पुराना अंश, मिस्र में बनी पॉकेट प्रति का हिस्सा

20 September 2026
डच पुस्तकालय में मिला ओडिसी का 1700 साल पुराना अंश, मिस्र में बनी पॉकेट प्रति का हिस्सा

यूट्रेक्ट: एक शोधकर्ता नीदरलैंड के पुस्तकालय में रखे प्राचीन मिस्री दस्तावेजों को पलट रहे थे, तभी उनके हाथ चर्मपत्र का एक फटा हुआ टुकड़ा लगा। उस पर होमर के महाकाव्य ओडिसी का एक हिस्सा दर्ज था। माना जा रहा है कि यह अंश करीब 300 ईस्वी में मिस्र में तैयार की गई ओडिसी की एक जेबी प्रति का हिस्सा है।

यह खोज रैडबाउड विश्वविद्यालय में यूनानी साहित्य के विशेषज्ञ प्रोफेसर मार्क डे क्रेई ने की। वह यूट्रेक्ट विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में रखी उन आरंभिक ईसाई पांडुलिपियों का अध्ययन कर रहे थे, जिन्हें पुस्तकालय ने बीसवीं सदी के मध्य में खरीदा था। मिस्री और यूनानी दस्तावेजों के इसी संग्रह में उन्हें चर्मपत्र का वह छोटा-सा टुकड़ा मिला, जिसके शब्द उन्होंने तुरंत पहचान लिए।

आकार में हथेली से भी छोटा टुकड़ा

यह अंश केवल 6.6 गुणा 7.7 सेंटीमीटर का है। इसमें महाकाव्य के बारहवें अध्याय की पंक्तियां दर्ज हैं। ये पंक्तियां उस प्रसंग का वर्णन करती हैं, जब सूर्यदेव हीलियोस को पता चलता है कि ओडिसियस के साथियों ने उनके अमर पशुओं को मारकर खा लिया है। प्रोफेसर डे क्रेई का कहना है कि इस महाकाव्य में बहुत से हिस्से उबाऊ हैं, लेकिन यह टुकड़ा संयोग से बेहद रोचक प्रसंग का निकला।

क्या है उस प्रसंग की कहानी

देवी सर्सी ने ओडिसियस को हीलियोस के द्वीप थ्रिनेकिया से दूर रहने की चेतावनी दी थी। लेकिन छह सिर वाले राक्षस स्किला और विशाल भंवर कैरिब्डिस से बचकर निकलने के बाद उनके साथी वहीं उतरना चाहते थे। ओडिसियस ने इस शर्त पर अनुमति दी कि कोई पशु को नुकसान नहीं पहुंचाएगा। महीने भर तूफान में फंसे रहने और भोजन खत्म होने पर साथियों ने वे पवित्र पशु मार डाले। इसके बाद हीलियोस की प्रार्थना पर ज्यूस ने जहाज नष्ट कर दिया और ओडिसियस को छोड़कर कोई नहीं बचा।

अब तक ऐसे सिर्फ 30 टुकड़े ही मिले

  • काल: यह अंश संभवतः तीसरी या चौथी शताब्दी की चर्मपत्र पुस्तिका का हिस्सा है।
  • स्थान: इसे मिस्र के फयूम मरूद्यान में तैयार किया गया माना जा रहा है।
  • दुर्लभता: अब तक इस तरह के केवल लगभग 30 टुकड़े ही दुनिया में खोजे जा सके हैं।

प्रोफेसर डे क्रेई के अनुसार यह टुकड़ा शायद इसलिए बच गया, क्योंकि यह जेब में रखी जाने वाली छोटी प्रति के बीच के हिस्से से आया था और दूसरे पन्नों ने इसकी रक्षा की। यह अंश प्राचीन मिस्री दस्तावेजों के बड़े संग्रह तक कैसे पहुंचा, यह अब भी अज्ञात है।

डे क्रेई ने यह टुकड़ा सबसे पहले 2024 में देखा था। यूट्रेक्ट विश्वविद्यालय संग्रह में रखे मिस्र के यूनानी-रोमन दस्तावेजों पर उनका पूरा अध्ययन जल्द ही एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित होने वाला है। इसी साल की शुरुआत में मिस्र में पुरातत्वविदों को रोमन काल की एक ममी के भीतर होमर के दूसरे महाकाव्य इलियड के पपाइरस अंश भी मिले थे।

इलियड और ओडिसी दोनों की रचना आठवीं शताब्दी ईसा पूर्व के उत्तरार्ध या सातवीं शताब्दी ईसा पूर्व के आरंभ में मानी जाती है। इनमें से पहला महाकाव्य दस साल चले ट्रॉय युद्ध का वर्णन करता है, जबकि दूसरा यूनानी नायक ओडिसियस की ट्रॉय से इथाका लौटने की दस वर्ष लंबी यात्रा की कथा कहता है।