पच्चीस टन के पत्थर और 18 किलोमीटर का सफर, ब्रिटेन के प्राचीन स्तंभों का रहस्य सुलझा

लंदन: उत्तरी इंग्लैंड के बरोब्रिज के पास खड़े विशाल पत्थरों की कतार सदियों से लोगों को हैरान करती रही है। डेविल्स एरोज नाम से मशहूर ये स्तंभ ब्रिटेन में बची हुई प्रागैतिहासिक पत्थर कतारों में सबसे ऊंचे हैं और इनकी ऊंचाई सात मीटर तक पहुंचती है। अब एक नए शोध ने बताया है कि इन्हें बनाने वालों ने 25 टन तक वजनी पत्थरों को कम से कम 18 किलोमीटर दूर से यहां तक पहुंचाया था।
यह अध्ययन कर्टिन यूनिवर्सिटी के नेतृत्व में यूनिवर्सिटी ऑफ यॉर्क के साथ मिलकर किया गया। यह पहला ऐसा शोध है, जिसने इन पत्थरों के भूवैज्ञानिक स्रोत की सटीक पहचान की है। जांच में सामने आया कि पत्थर उत्तरी यॉर्कशायर की ब्रिमहम रॉक्स से लाए गए थे, जबकि अब तक माना जाता था कि वे पास में स्थित प्लम्पटन रॉक्स से लिए गए होंगे।
नजदीक का विकल्प छोड़कर दूर का चुनाव
अध्ययन के मुख्य लेखक डॉ. एंथनी क्लार्क के अनुसार सबसे चौंकाने वाली बात यही है कि पत्थर सबसे नजदीकी स्रोत से नहीं लिए गए। उन्हें जानबूझकर 18 किलोमीटर दूर के एक कठिन भूभाग से चुना गया। उन्होंने कहा कि इतने भारी पत्थरों को इतनी दूर तक ले जाने के लिए असाधारण योजना, तालमेल और इंजीनियरिंग कौशल की जरूरत रही होगी, और जिस जगह से ये पत्थर लाए गए, उसका उस समय के लोगों के लिए कोई विशेष महत्व रहा होगा।
टेप से उठाए गए सूक्ष्म कण
शोध में स्मारक को नुकसान पहुंचाए बिना नमूने लेने की एक नई तकनीक इस्तेमाल की गई। शोधकर्ताओं ने चिपकने वाली टेप की मदद से पत्थरों की सतह से खनिजों के बेहद सूक्ष्म कण उठाए। इसके बाद इन कणों की आयु के संकेतों की तुलना संभावित स्रोत स्थलों से लिए गए भूवैज्ञानिक नमूनों से की गई।
शोध की प्रमुख बातें
- ऊंचाई: ये स्तंभ सात मीटर तक ऊंचे हैं और ब्रिटेन की सबसे ऊंची बची हुई प्रागैतिहासिक पत्थर कतार हैं।
- वजन और दूरी: करीब 25 टन वजनी पत्थरों को कम से कम 18 किलोमीटर दूर से लाया गया।
- समय: इन्हें नवपाषाण काल के अंतिम दौर या कांस्य युग के शुरुआती दौर में, संभवतः करीब दो हजार ईसा पूर्व खड़ा किया गया।
- प्राकृतिक कारण खारिज: साक्ष्यों से यह भी साफ हुआ कि पत्थर हिमनद जैसी प्राकृतिक प्रक्रिया से यहां नहीं पहुंचे, बल्कि इंसानों ने जानबूझकर उन्हें यहां तक पहुंचाया।
सह-लेखक और यूनिवर्सिटी ऑफ यॉर्क के डॉ. जिम लीरी ने कहा कि नतीजे दिखाते हैं कि उस दौर के समुदाय इस बात को लेकर सोच-समझकर फैसला करते थे कि उनके पत्थर कहां से आएं। उनके मुताबिक यह चुनाव उस समय के लोगों के भूदृश्य से रिश्ते और साझा विश्वासों की ओर इशारा करता है।
शोधकर्ताओं का मानना है कि यह तकनीक आगे दूसरे प्राचीन स्मारकों की जांच में भी उपयोगी साबित हो सकती है, क्योंकि इसमें स्मारक को कोई नुकसान नहीं पहुंचता। संरक्षित स्थलों पर पारंपरिक नमूना लेने की अनुमति आमतौर पर नहीं मिलती, इसलिए यह रास्ता खास अहमियत रखता है।
