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फार्मा कंपनियों की मनमानी पर सुप्रीम कोर्ट का हंटर, जानिए कैंसर दवाओं की कीमतों को क्यों बताया 'दिनदहाड़े डकैती'

22 September 2026
फार्मा कंपनियों की मनमानी पर सुप्रीम कोर्ट का हंटर, जानिए कैंसर दवाओं की कीमतों को क्यों बताया 'दिनदहाड़े डकैती'

हाइलाइट्स:

  • सुप्रीम कोर्ट ने कैंसर दवाओं की 10 गुना तक अधिक MRP को बताया 'जबरन वसूली' और 'दिनदहाड़े डकैती'।
  • कोर्ट ने पूछा- रिटेलर रेट (PTR) से 10 गुना ज्यादा MRP छापने की छूट क्यों? इस पर 10-16% की कैप क्यों नहीं?
  • आयुष्मान भारत का भी हुआ जिक्र: ₹200 की दवा पर ₹2,000 का बिल वसूलना टैक्सपेयर्स के पैसे के साथ सीधा फ्रॉड।
  • सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से मांगा जवाब, मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर को तय।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने जीवनरक्षक और कैंसर की दवाओं की अत्यधिक और अनियंत्रित कीमतों पर बेहद सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने दवा कंपनियों और रिटेलर्स द्वारा तय की जा रही भारी-भरकम एमआरपी (MRP) को 'दिनदहाड़े डकैती' और मरीजों के खिलाफ 'जबरन वसूली' करार दिया। अदालत ने इस बात पर भी गहरी नाराजगी जताई कि जिस तंत्र और अधिकारियों को इस लूट पर रोक लगानी चाहिए, वे अब तक चुप क्यों बैठे हैं।

यह कड़ी टिप्पणी जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने दवाओं पर सख्त मूल्य नियंत्रण (प्राइस कंट्रोल) लागू करने की मांग वाली दो याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान की।

सुनवाई के दौरान कोर्ट के संज्ञान में लाया गया कि कैंसर की जरूरी दवाओं का रिटेलर प्राइस (PTR) मात्र ₹2,700 होता है, जबकि कंपनियों द्वारा उसी दवा पर अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) ₹27,000 तक छापा जाता है।

इस पर तल्ख टिप्पणी करते हुए जस्टिस संदीप मेहता ने कहा, "यह सीधे तौर पर मरीजों के खिलाफ जबरन वसूली और उपद्रव है। एक निर्माता कैंसर की दवा का पीटीआर ₹2,700 रखता है और उस पर ₹27,000 की एमआरपी छाप देता है। यह हैरान करने वाला और भयानक है! दवा की वास्तविक कीमत से 10 गुना ज्यादा एमआरपी छापने की इजाजत क्यों दी जा रही है? इससे रिटेलर्स को मनमाने दाम वसूलने की खुली छूट मिल जाती है। एमआरपी का मार्जिन 10% या 16% तक सीमित क्यों नहीं हो सकता? यह असीमित क्यों होना चाहिए?"

जस्टिस मेहता ने सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं में हो रहे दुरुपयोग का भी गंभीर मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि कई गरीब और गंभीर मरीजों का इलाज प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PMJAY) या आयुष्मान भारत के तहत होता है।

उन्होंने सवाल उठाया, "हॉस्पिटलों में जो दवा ₹200 की होती है, उसे ₹2,000 की एमआरपी पर दिखाया जाता है और फिर अस्पताल सरकार से उसका रीइंबर्समेंट लेते हैं। यह सीधे तौर पर टैक्सपेयर्स के पैसे की लूट और सीधा फ्रॉड है।"

पीठ ने बेहद भावुक और कड़े शब्दों में कहा कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए आम लोग अपने घर, जमीन और गहने तक बेच देते हैं। ऐसे असहाय मरीजों को इस तरह से लूटना किसी 'नरसंहार' से कम नहीं है।

अदालत ने सुझाव दिया कि यदि सभी आवश्यक दवाओं को सख्त प्राइस फिक्सेशन (मूल्य निर्धारण) के दायरे में लाया जाए, तो अलग से जेनेरिक दवाओं के प्रचार-प्रसार की जरूरत ही नहीं पड़ेगी, क्योंकि तब सभी दवाओं के दाम सामान्य और नियंत्रित रहेंगे।

याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि 2007 के संशोधन के तहत सभी दवाएं 'आवश्यक' (Essential) श्रेणी में आती हैं। ऐसे में कुछ चुनिंदा दवाओं को ही मूल्य नियंत्रण में रखना और बाकी को खुली छूट देने के पीछे कोई तार्किक आधार नहीं है। याचिका में यह भी मांग की गई कि डॉक्टरों द्वारा अनिवार्य रूप से जेनेरिक दवाएं लिखे जाने और फॉर्मुलेशन्स को किफायती बनाने के लिए स्पष्ट निर्देश जारी किए जाएं।

केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) के.एम. नटराज ने अदालत को आश्वस्त किया कि दवाओं की कीमतें नियंत्रित करने के लिए जो भी मौजूदा तंत्र उपलब्ध है, उसे कोर्ट के सामने रखा जाएगा और व्यवस्था में आवश्यक सुधारों की समीक्षा की जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि दवाओं का मूल्य निर्धारण एक बेहद गंभीर और जनहित से जुड़ा मुद्दा है। अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर को तय की है।