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मूडीज ने बढ़ाया भारत की वृद्धि का अनुमान: 6 से बढ़ाकर 7 प्रतिशत किया, पहली छमाही में 8.2 प्रतिशत की रफ्तार

21 September 2026
मूडीज ने बढ़ाया भारत की वृद्धि का अनुमान: 6 से बढ़ाकर 7 प्रतिशत किया, पहली छमाही में 8.2 प्रतिशत की रफ्तार

नई दिल्ली: वैश्विक रेटिंग संस्था मूडीज ने भारत की आर्थिक वृद्धि का अनुमान बढ़ा दिया है। चालू वित्त वर्ष 2026-27 के लिए सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर का अनुमान 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 7 प्रतिशत कर दिया गया है। यह बदलाव कैलेंडर वर्ष 2026 की पहली छमाही में दर्ज हुई मजबूत रफ्तार को देखते हुए किया गया है।

आंकड़ों के मुताबिक कैलेंडर वर्ष 2026 की पहली छमाही में वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद सालाना आधार पर 8.2 प्रतिशत की दर से बढ़ा। इससे पहले पूरे कैलेंडर वर्ष 2025 में यह दर 7.3 प्रतिशत रही थी। यानी अर्थव्यवस्था ने बीते साल की तुलना में तेज गति पकड़ी है और यही तेजी अनुमान में संशोधन की वजह बनी।

एक नजर में आंकड़े

  • नया अनुमान: वित्त वर्ष 2026-27 के लिए वृद्धि दर 7 प्रतिशत
  • पुराना अनुमान: पहले यह 6 प्रतिशत आंका गया था
  • पहली छमाही: कैलेंडर वर्ष 2026 में 8.2 प्रतिशत की वृद्धि
  • पिछला वर्ष: कैलेंडर वर्ष 2025 में 7.3 प्रतिशत की दर

रेटिंग समीक्षा और महंगाई पर नजर

संस्था ने भारत की साख को बीएए3 श्रेणी में रखते हुए उसे समीक्षा के दायरे में रखा है। समीक्षा का मतलब यह है कि आने वाले महीनों के आंकड़ों के आधार पर रेटिंग में बदलाव पर विचार किया जा सकता है। निवेशकों की नजर इस समीक्षा के नतीजे पर रहेगी, क्योंकि इसका असर विदेशी पूंजी की आवक पर पड़ता है।

महंगाई को लेकर संस्था ने सतर्क रुख अपनाया है। उसका कहना है कि खुदरा महंगाई दर उसके 4.8 प्रतिशत के अनुमान से ऊपर जा सकती है। तुलना के लिए, वित्त वर्ष 2025-26 में महंगाई दर औसतन 2.4 प्रतिशत के बेहद नीचे स्तर पर रही थी, जो उपभोक्ताओं के लिए राहत भरी रही।

एक अन्य वित्तीय शोध संस्था जेफरीज का आकलन है कि इस दौरान नाममात्र वृद्धि दर 11 से 12 प्रतिशत के बीच रह सकती है। नाममात्र वृद्धि में महंगाई का असर भी शामिल होता है और यही आंकड़ा कंपनियों की बिक्री तथा सरकार के कर संग्रह से सीधे जुड़ा रहता है।

अर्थशास्त्रियों का कहना है कि वृद्धि अनुमान बढ़ना घरेलू मांग, सेवा क्षेत्र के विस्तार और निवेश में सुधार का संकेत है। वृद्धि तेज रहने पर रोजगार के नए अवसर बनते हैं और सरकार के पास अवसंरचना तथा कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च करने की गुंजाइश भी बढ़ती है।