गरदेज का महाविनायक: अफगानिस्तान में मिली संगमरमर की गणेश प्रतिमा और डेढ़ हजार साल पुराने शिलालेख की कहानी

इतिहास डेस्क: मई 1956 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का एक दल अफगानिस्तान में था, तभी उसे एक असाधारण जानकारी मिली। काबुल से करीब 70 किलोमीटर दूर गरदेज के पास कभी संगमरमर की एक गणेश प्रतिमा मिली थी, जिसे काबुल के एक दरगाह परिसर में रखकर वहां के हिंदू परिवार पूजते आ रहे थे। इस प्रतिमा पर खुदा दो पंक्तियों का शिलालेख आगे चलकर दक्षिण एशिया के इतिहास की एक अहम कड़ी साबित हुआ।
दल के अधिकारियों टी एन रामचंद्रन और वाई डी शर्मा ने नई दिल्ली लौटकर इसकी रिपोर्ट दर्ज कराई। बाद में इतिहासकार और पुरातत्वविद मधुकर केशव ढवलीकर ने इसे भारत और अफगानिस्तान की साझा कला परंपरा का उदाहरण बताते हुए लिखा कि यह प्रतिमा अपेक्षाकृत साधारण गुणवत्ता के संगमरमर से बनी है, करीब 24 इंच ऊंची और 14 इंच चौड़ी है।
प्रतिमा में क्या-क्या दिखता है
यह खड़ी मुद्रा की प्रतिमा है। हाथी का सिर, बाईं ओर मुड़ी हुई टूटी सूंड, चारों भुजाएं खंडित, कमर पर व्याघ्र चर्म और जनेऊ की जगह लिपटा सर्प इसकी पहचान हैं। बड़े उदर के कारण इसे लंबोदर स्वरूप से जोड़ा जाता है। कंधों की बनावट में भारतीय-यूनानी शैली की छाप है, जबकि सिर पर बंधे रिबन वाले मुकुट में फारसी असर दिखाई देता है।
- सामग्री: साधारण गुणवत्ता का संगमरमर, ऊंचाई करीब 24 इंच
- शैली: भारतीय-यूनानी कंधे और फारसी असर वाला मुकुट
- काल: पांचवीं से छठी शताब्दी के बीच का अनुमान
शिलालेख ने बताया नाम और तिथि
प्रतिमा पर ब्राह्मी की सिद्धमातृका लिपि में संस्कृत का दो पंक्तियों का लेख उत्कीर्ण है, जिसका अध्ययन पुरालेखविद डी सी सरकार ने किया। लेख का आशय है कि महाराजाधिराज शाही खिंगल ने अपने शासन के आठवें वर्ष में, महाज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को, विशाखा नक्षत्र और सिंह लग्न में इस महाविनायक की प्रतिष्ठा कराई। इतनी विस्तृत तिथि किसी प्राचीन प्रतिमा पर कम ही मिलती है।
इसी क्षेत्र में एक और गणेश प्रतिमा काबुल से करीब दस मील उत्तर में शंकर धर नाम की जगह पर मिली थी, जिसे बाद में काबुल के राष्ट्रीय संग्रहालय में रखा गया। उसका काल चौथी शताब्दी के आसपास आंका गया। संग्रहालय को बाद के वर्षों में हुए नुकसान के बाद इन प्रतिमाओं के वर्तमान ठिकाने की पुख्ता जानकारी उपलब्ध नहीं है।
गणेश के स्वरूप का विकास भी दिलचस्प रहा है। ऋग्वेद की प्रसिद्ध पंक्ति गणानां त्वां गणपतिं हवामहे को अक्सर गणेश से जोड़ा जाता है, जबकि विद्वानों के अनुसार वहां संकेत बृहस्पति की ओर है। पांचवीं शताब्दी ईसा पूर्व के मानवगृह्यसूत्र में चार विनायकों के नाम मिलते हैं, जिनमें हस्तिमुख, वक्रतुंड, दंती और लंबोदर शामिल हैं। पुरातत्वविद कुरुष एफ दलाल बताते हैं कि आरंभ में गणपति को विघ्नकर्ता माना जाता था, विघ्नहर्ता की छवि बाद में बनी।
इतिहासकार आनंद कानिटकर के मुताबिक यह प्रतिमा उन व्यापार मार्गों की गवाही देती है जो मगध से तक्षशिला और गांधार से बल्ख तक फैले थे। कुषाण काल के सिक्कों पर ईरानी, भारतीय और यूनानी देवताओं का साथ-साथ दिखना भी इसी मेलजोल का प्रमाण है। लेखक देवदत्त पटनायक ने भी भारतीय-यूनानी सिक्कों और अलग-अलग सभ्यताओं में पशु-मुख देवताओं की परंपरा का उल्लेख किया है।
