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यूरोप के बाजार में भारतीय कारों को बड़ी राहत: पहले साल ढाई लाख कारों पर आठ प्रतिशत शुल्क, पांचवें साल से शून्य

14 September 2026
यूरोप के बाजार में भारतीय कारों को बड़ी राहत: पहले साल ढाई लाख कारों पर आठ प्रतिशत शुल्क, पांचवें साल से शून्य

नई दिल्ली: भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुए मुक्त व्यापार समझौते के तहत भारत में बनी कारों के लिए यूरोप का बाजार पहले से कहीं ज्यादा सुलभ होने जा रहा है। समझौते के पहले ही वर्ष में ढाई लाख भारतीय यात्री कारों को यूरोपीय संघ में रियायती आठ प्रतिशत शुल्क पर प्रवेश मिलेगा, और दसवें वर्ष से यह सीमा बढ़कर चार लाख कारें प्रतिवर्ष हो जाएगी।

शुल्क में कटौती चरणबद्ध तरीके से होगी। पहले वर्ष आठ प्रतिशत, दूसरे वर्ष छह प्रतिशत, तीसरे वर्ष चार प्रतिशत और चौथे वर्ष दो प्रतिशत शुल्क लगेगा। पांचवें वर्ष से यह शुल्क पूरी तरह समाप्त हो जाएगा, यानी तय कोटे के भीतर आने वाली भारतीय कारें यूरोपीय बाजार में बिना किसी आयात शुल्क के पहुंचेंगी।

किन कारों को मिलेगा फायदा

यह रियायत भारत में निर्मित पारंपरिक ईंधन वाली कारों और हाइब्रिड इलेक्ट्रिक वाहनों पर लागू होगी, बशर्ते उनका सीआईएफ मूल्य 50 हजार यूरो तक हो। सीआईएफ मूल्य में वाहन की खरीद कीमत के साथ यूरोपीय बंदरगाह तक पहुंचाने का माल भाड़ा और बीमा शामिल होता है। तय कोटे से अधिक निर्यात होने वाली कारों पर सामान्य एमएफएन शुल्क ही लागू रहेगा।

50 हजार यूरो से अधिक सीआईएफ मूल्य वाली कारों को कोटा आधारित रियायत तो नहीं मिलेगी, लेकिन उन पर लगने वाला शुल्क भी चरणबद्ध ढंग से घटेगा। ऐसी कारों पर पहले वर्ष आठ प्रतिशत शुल्क लगेगा, जो दसवें वर्ष तक घटकर शून्य पर आ जाएगा।

इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए अलग कोटा

बैटरी इलेक्ट्रिक, प्लग-इन हाइब्रिड और अन्य नई तकनीक वाले वाहनों के लिए अलग टैरिफ रेट कोटा तय किया गया है। इसमें 40 हजार यूरो तक सीआईएफ मूल्य वाले वाहन शामिल होंगे और यह व्यवस्था समझौते के पांचवें वर्ष से शुरू होगी।

  • शुरुआत: पांचवें वर्ष में 27,500 वाहनों को आठ प्रतिशत शुल्क पर प्रवेश।
  • विस्तार: नौवें वर्ष तक कोटा बढ़कर 60,500 वाहन और 14वें वर्ष से 1.25 लाख वाहन प्रतिवर्ष।
  • शुल्क समाप्ति: इस श्रेणी पर शुल्क नौवें वर्ष से पूरी तरह खत्म हो जाएगा।

40 हजार से 60 हजार यूरो सीआईएफ मूल्य वाली कारों के लिए पांचवें वर्ष से 16,250 वाहनों का कोटा तय किया गया है, जिसे 14वें वर्ष तक बढ़ाया जाएगा।

निर्यात के लिए क्यों अहम है यह रास्ता

यूरोपीय संघ दुनिया के सबसे बड़े और सबसे प्रतिस्पर्धी वाहन बाजारों में है, जहां गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों की कसौटी कठिन मानी जाती है। उद्योग से जुड़े लोगों का मानना है कि शुल्क में क्रमिक कटौती से भारतीय कंपनियों को अपनी उत्पादन योजना लंबी अवधि के लिहाज से बनाने का मौका मिलेगा, क्योंकि उन्हें पहले से पता रहेगा कि किस वर्ष कितना शुल्क लगेगा।

कोटा और मूल्य सीमा तय होने का व्यावहारिक अर्थ यह है कि रियायत का सबसे ज्यादा लाभ मध्यम श्रेणी की उन कारों को मिलेगा, जिनमें भारतीय विनिर्माण की पकड़ पहले से मजबूत है। इससे घरेलू कल-पुर्जा उद्योग और वाहन निर्माण से जुड़ी आपूर्ति शृंखला पर भी सकारात्मक असर पड़ने की उम्मीद जताई जा रही है।