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महाराष्ट्र में 560 करोड़ की ट्रांसमिशन परियोजना सौंपी गई, आरईसी ने जारी किया देश का पहला टोकनाइज्ड कॉरपोरेट बॉन्ड

14 September 2026
महाराष्ट्र में 560 करोड़ की ट्रांसमिशन परियोजना सौंपी गई, आरईसी ने जारी किया देश का पहला टोकनाइज्ड कॉरपोरेट बॉन्ड

नई दिल्ली: बिजली क्षेत्र से जुड़ी दो अहम खबरें एक साथ सामने आई हैं। आरईसी पावर डेवलपमेंट एंड कंसल्टेंसी लिमिटेड ने मुसलगांव पावर ट्रांसमिशन लिमिटेड को सफल बोलीदाता महाराष्ट्र राज्य विद्युत पारेषण कंपनी लिमिटेड को सौंप दिया है, वहीं आरईसी लिमिटेड ने भारत का पहला टोकनाइज्ड कॉरपोरेट बॉन्ड जारी किया है।

नासिक क्षेत्र में बनेगा नया सब स्टेशन

मुसलगांव परियोजना का हस्तांतरण 9 सितंबर को पूरा हुआ। करीब 560 करोड़ रुपये की इस परियोजना को 12 महीने में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके तहत मुसलगांव में 220/132/33 केवी का नया सब स्टेशन बनाया जाएगा।

  • 220 केवी लाइन: मुसलगांव-बबलेश्वर-रेमंड के बीच करीब 111 किलोमीटर लंबी डबल सर्किट लाइन।
  • 132 केवी लाइन: मुसलगांव-सिन्नर के बीच करीब 13 किलोमीटर लंबी डबल सर्किट लाइन।

परियोजना टैरिफ आधारित प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया के जरिये बीओओटी आधार पर दी गई है। इस व्यवस्था में चयनित कंपनी परियोजना का निर्माण, स्वामित्व, संचालन करती है और तय अवधि के बाद उसे हस्तांतरित करती है। पारेषण ढांचा मजबूत होने का सीधा असर क्षेत्र में बिजली आपूर्ति की स्थिरता और औद्योगिक इकाइयों की जरूरतों पर पड़ता है।

सेबी के सैंडबॉक्स में देश का पहला टोकनाइज्ड बॉन्ड

दूसरी ओर आरईसी लिमिटेड ने सेबी के नियामकीय सैंडबॉक्स के तहत देश का पहला टोकनाइज्ड कॉरपोरेट बॉन्ड जारी कर एक नई शुरुआत की है। इस पायलट निर्गम में 500 करोड़ रुपये जुटाए गए, जबकि निवेशकों की ओर से 796 करोड़ रुपये की बोलियां प्राप्त हुईं।

बॉन्ड की अवधि एक वर्ष नौ महीने है और इस पर 7.30 प्रतिशत की दर तय की गई है। निर्गम एनएसई के इलेक्ट्रॉनिक बिडिंग प्लेटफॉर्म के जरिये किया गया और इसे एनएसई तथा बीएसई दोनों पर सूचीबद्ध कराया गया है।

एक ही दिन में भुगतान, आवंटन और लिस्टिंग

इस निर्गम की सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि टोकनाइजेशन के जरिये भुगतान, आवंटन और लिस्टिंग की पूरी प्रक्रिया एक ही दिन में पूरी कर ली गई। पारंपरिक व्यवस्था में इन चरणों को पूरा होने में आमतौर पर अधिक समय लगता है।

बाजार से जुड़े जानकारों का मानना है कि निर्धारित समयसीमा घटने से निवेशकों की पूंजी कम समय के लिए अटकती है और जारीकर्ता कंपनी के लिए भी प्रक्रिया सरल होती है। मांग निर्गम आकार से अधिक रहना यह भी दर्शाता है कि नई तकनीक आधारित व्यवस्था को लेकर संस्थागत निवेशकों में भरोसा बना है। नियामकीय सैंडबॉक्स में हुए इस प्रयोग के नतीजों के आधार पर ही आगे इस व्यवस्था के विस्तार पर विचार होगा।